Sunday, December 25, 2016

अटल का ये दबा-छिपा 'अटल प्रेम'

भारतीय राजनीति के शीर्ष पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी ने भी प्यार किया था, और उसे ताउम्र निभाया भी। वाजपेयी से एक बार सवाल पूछा गया था कि आप अब तक कुंवारे क्यों हैं, जवाब में अपनी वाकपटु शैली में वाजपेयी ने लाजवाब करते हुए कहा था कि मैं अविवाहित हूं लेकिन कुंवारा नहीं हूं। वाजपेयी के इस बयान का मर्म चाहे जो भी निकाला जाए लेकिन इस कुंवारे राजनेता की ज़िंदगी का एक हिस्सा ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज से जुड़ा है। वो अतीत जिसका जिक्र दबी जुबान कभी-कभी हो जाता है। 
अटल शादी करना चाहते थे, आगरा के वीमेंस ट्रेेनिंग कॉलेज (डब्ल्यूटीसी) की हिंदी शिक्षिका डॉक्टर शारदा मिश्रा से मिलने-जुलने भी आते थे। बाद में शारदा के भाई का निधन हो गया, और उन्होंने शादी न करने का फैसला किया जिसे उनके साथ अटल ने भी निभाया। बहरहाल, अटल के जीवन में जिस महिला की सबसे बड़ी भूमिका रही, वो थीं राजकुमारी कौल। ग्वालियर अटल की जन्मभूमि है और राजकुमारी कौल का वाजपेयी से नाता उस वक्त से जुड़ा जब दोनों ग्वालियर के इसी विक्टोरिया कॉलेज (अब लक्ष्मीबाई कॉलेज) में पढ़ते थे। कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ वाजपेयी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में प्रचारक के साथ ही जनसंघ की राजनीति से भी जुड़े, वहीं कौल का परिवार शादी के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज में सेटल हो गया। राजकुमारी के पति बीएन कौल रामजस कॉलेज के दर्शन विभाग के अध्यक्ष हो गए। कौल का परिवार कैंपस में रहता था। कहते हैं कि इसी दौरान ग्वालियर की दोस्ती एक बार फिर परवान चढ़ी और वाजपेयी दोबारा कौल परिवार के संपर्क में आए। सन 1964 में राजकुमारी कौल ने अपने पति मिस्टर कौल से तलाक लेने का मन भी बना लिया था और वाजपेयी से शादी करने की बात भी हो गई थी। तब संघ के एक वरिष्ठ  प्रचारक ने वाजपेयी से कहा कि इससे उनके राजनीतिक जीवन में बाधा आएगी और तब यह फैसला टाल दिया गया। मिसेज कौल और उनका परिवार वाजपेयी के साथ रहने तो लगा लेकिन यह तय हुआ कि मिसेज कौल कभी सार्वजनिक जीवन में सामने नहीं आएंगी और यह वादा उन्होंने आखिर तक निभाया भी। अटल जी की बहन कमला दीक्षित आगरा में रहती थीं। बात 2005 में किसी समय की होगी, अटलजी के जन्मदिन पर दैनिक जागरण ने विशेष सामग्री देने की तैयारी की थी। मैं कमलाजी से मिलने गया। चर्चा शारदा मिश्रा की भी चली और मैडम कौल की भी। बकौल कमला जी, शारदा का चैप्टर वाजपेयी जी की जिंदगी में ज्यादा दिन नहीं चला लेकिन मैडम कौल उनके जीवन की जैसे महारानी थीं। घर-परिवार का कोई भी काम उनसे पूछे बिना नहीं होता। यहां तक कि राखी-टीका करने का नेग भी मैडम कौल ही देतीं। घर में क्या बनेगा, अटलजी क्या खाएंगे, उनसे कौन मिलेगा या कौन नहीं, मैडम कौल से ही पूछा जाता। निजी सचिव शिवकुमार पारिख अकेले एेसे व्यक्ति रहे जो इस हैसियत में थे कि मुलाकातियों के बारे में अपने स्तर से निर्णय कर लें, बाकी तो सब-कुछ मैडम कौल को ही बताकर किया जाता। मैडम कौल अगर किसी बहन से नाराज हो जातीं तो परिजनों को उन्हें ही मनाना पड़ता। अटल बीच में न बोलते। कमला जी ने बताया था कि इमरजेंसी के दौरान अटलजी की जिंदगी में मैडम कौल की भूमिका बढ़ी। बाकी परिवार गिरफ्तारी से डरकर किनारे हो गया तो वही सामने आईं। जेल में खाना लेकर जातीं, घंटों बाहर इंतजार करतीं और कभी-कभी तो... पुलिस-प्रशासनिक अफसरों की झिड़कियां भी सहनी पड़तीं। हर अच्छे-बुरे वक्त में साथ देकर ही वो घर की सुपरपॉवर बन गईं। उनकी बेटी नमिता अटलजी की उत्तराधिकारी बनीं। एक जमाने में दिल्ली के ओबेराय होटल में काम करने वाले और कौल के दामाद रंजन भट्टाचार्य के बारे में लोग कहते हैं कि एनडीए सरकार में असल में सत्ता उन्हीं के हाथ में थी।  आरोप है कि मई 2009 में उन्होंने नीरा राडिया को तसल्ली दिलाई थी कि वह कांग्रेस में अपने संपर्कों के जरिए दयानिधि मारन को टेलीकॉम मंत्री नहीं बनने देंगे। यानी जब भाजपा अपनी लगातार दूसरी हार के गम में डूबी थी, वाजपेयी के दत्तक दामाद कांग्रेस का मंत्रिमंडल सजाने में व्यस्त थे। कल्पना कर सकते हैं तब वाजपेयी को कैसा लगा होगा? ऐसा भी नहीं कि रंजन भट्टाचार्य को लेकर विवाद नहीं हुए। संघ प्रमुख केसी सुदर्शन ने एक बार कहा था कि भट्टाचार्य और वाजपेयी के प्रधान सचिव ब्रजेश मिश्रा की वजह से भाजपा की बुरी गत हुई। यूटीआई घोटाले में भी भट्टाचार्य का नाम उछला था। लेकिन प्रबंधन का कमाल कहिए कि कहीं कोई नुकसान नहीं हुआ। दोनों की यह प्रेम कहानी कभी ज्यादा चर्चा में नहीं रही। हां, एक बार जब वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री बने थे तब खबर उड़ी थी कि मैडम कौल ने पूरा श्रृंगार किया और सामने आईं, जबकि सामाजिक रूप से वह विधवा थीं। इसी साल दो मई को मैडम कौल का देहांत हुआ और अस्वस्थ वाजपेयी पूरी तरह से अकेले हो गए।
(चित्रः अटल की धेवती निहारिका, दत्तक पुत्री नमिता और रंजन भट्टाचार्य)

Wednesday, November 2, 2016

2 नवम्बर 1990: सियासत के 26 बरस



दो नवम्बर 1990... आज से ठीक 26 साल पहले। देश में उग्र हिंदुत्व के पुनर्जन्म का दिन। धर्मनिरपेक्षता की आड़ में मुस्लिम तुष्टिकरण के सबसे बड़े अलम्बरदार मुलायम सिंह यादव का उदभव। मैं छात्र  था उन दिनों लेकिन जागरूक, प्रतिदिन अखबार पढ़ने वाला। आज मेरा पसंदीदा अखबार था...। हिंदुत्व तब न कोई विचारधारा थी और न हिंदुओं के बीच लोकप्रिय कोई शब्द। अयोध्या चर्चा में थी। भगवान राम की जन्मस्थली अयोध्या में मंदिर बनाने के लिए माहौल गर्मा रहा था। विश्व हिंदू परिषद और आज की भाजपा के तत्कालीन नेतागण चिंघाड़ते, अक्सर नारे छपा करते- राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे।
हिंदुओं का धुव्रीकरण होने लगता। कांग्रेस की छात्र इकाई राष्ट्रीय छात्र संगठन का जिला अध्यक्ष होने के बावजूद मेरे भीतर भी उबाल आता। मैं ही क्या, हर युवा की यही कहानी थी। चर्चाओं में मंदिर होता, रामलला होते। श्रद्धा से सिर झुक जाता और आक्रोश से भुजाएं फड़कने लगतीं। बचपन से जवान होने की साक्षी मुस्लिम बहुल गलियां बुरी लगने लगतीं, मुस्लिम भी फूटी आंख नहीं सुहाते। सियासत के दांव थे तो वो सफल हो रहे थे और अगर... मंदिर बनाने का आंदोलन था तो जनसमर्थन से वांछित नतीजे देने लगा था। भाजपा के पितृ पुरुष लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा रोककर लालू प्रसाद यादव हीरो बन चुके थे और इधर मुलायम सिंह यादव को जैसे मौके का इंतजार था। वो चेतावनियां देते रहते। उन्होंने एक जनसभा में कहा कि जिन श्रद्धालुओं ने 14 कोसी परिक्रमा करने की योजना बनाई है, वे इससे दूर ही रहें। माहौल गर्म था। आमने-सामने वाला। हिंदू-मुस्लिम को भाई-भाई बताने वाले तब छिप-से गए थे। तब टीवी चैनल इतना तेज नहीं हुआ करते थे। बाकी अखबार एक तरफ और दूसरी ओर, आज। तीन नवम्बर 1990 की रिपोर्ट थी... बीजेपी सांसद उमा भारती, वीएचपी नेता अशोक सिंहल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वामी वामदेव वामदेव ने हनुमानगढ़ी में करीब 15000 कारसेवकों का नेतृत्व किया। पुलिस ने विवादित ढांचे की ओर जाने वाली गलियों में बैरिकेडिंग कर दी, हथियारबंद पुलिसकर्मी चौराहे की दुकानों की छतों पर तैनात हो गए। कारसेवकों ने चाल चली। एक बूढ़े आदमी और महिला को रुकावट वाले रास्ते से आगे जाने की इजाजत दे दी गई। तब उम्रदराज कारसेवक उम्र में अपने से छोटे पुलिस‍कर्मियों के पांव छूने के लिए आगे झुकने लगे। सकुचाए पुलिसकर्मी अपने पैर हटाते गए, कारसेवक अपने पैर आगे बढ़ाते चले गए पर यह ड्रामा बहुत देर तक नहीं चल सका। और यह तारीख हिंदुत्व के इतिहास का अहम पड़ाव बन गई। कुल मिलाकर 15 कारसेवक मारे गए थे।मुलायम को ‘मुल्ला मुलायम’ कहा गया। वे यूपी में मुस्लिम वोटरों के रहनुमा बनकर उभरे। फायरिंग के तुरंत बाद ही मुलायम ने समाजवादी पार्टी बनाई थी लेकिन छह महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। आखिरकार चार नवम्बर को मृत कारसेवकों को अंतिम संस्कार कर दिया गया। उनकी चिताओं की राख को देशभर में गांवों और शहरों में ले जाया गया, जिससे उन्माद फैले। इसके करीब दो साल बाद ही बाबरी मस्जिद ढहा दी गई। सत्ता और सियासत ने इस बीच कई करवटें ली हैं। उत्तर प्रदेश चूंकि इस समय विधानसभा चुनाव के मुहाने पर है और राम मंदिर का मुद्दा फिर दबे-छिपे उठाया जा रहा है। इन पूरे 26 वर्षों में चरम तक पहुंच गए मुलायम सिंह आज मजबूर हाल हैं और उनकी समाजवादी पार्टी संकट में। बेटे और भाई के बीच उत्तराधिकार की जंग में मुलायम निरीह प्रतीत हो रहे हैं और तस्वीर का दूसरा पहलू यानी भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदें जोर मार रही हैं। भाजपा यदि सत्ता तक पहुंची तो यह इसी आंदोलन का एक नतीजा होगा, और मुलायम सिंह की सियासत ढेर हुई तो भी...  

Monday, October 17, 2016

मार्कंडेय काटजू पेश हों...

यह जोखिम ले रहा हूं मैं। न्यायपालिका के किसी फैसले पर टिप्पणी करना जोखिम से कम नहीं। बेशक, न्यायमूर्ति न्याय के देवता हैं, योग्यता में हम-आप से कई गुना श्रेष्ठ लेकिन गलती अगर हो गई हो तो? गलती इंसान से ही तो होती है। फिर भी, आलोचना यदि सुप्रीम कोर्ट का एक पूर्व जज करे तो मामला गंभीर ही नहीं, बल्कि गंभीरतम है। एक हत्याकांड में अपने ब्लॉग पर टिप्पणी के बाद पूर्व जस्टिस मार्कंडेय काटजू को सुप्रीम कोर्ट ने पेश होकर बहस करने के लिए कहा है। 
यह विरलतम है, पहला मामला है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश को फैसलों की आलोचना करने के लिए तलब किया है। पहले जानते हैं कि यह मामला है क्या और विवाद का विषय क्यों बना? दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने केरल के चर्चित सौम्या रेप एवं मर्डर केस में दोषी गोविन्दाचामी की फांसी की सजा रद्द कर दी थी। उसे सिर्फ रेप का दोषी माना और उम्र कैद की सजा सुनाई थी। सबूतों के अभाव में गोविन्दचामी को हत्या का दोषी नहीं माना गया था। मंजक्कड़ की रहने वाली 23 साल की सौम्या एक फरवरी 2011 को एर्णाकुलम से शोरनूर जा रही थी। दोषी गोविंदाचामी सौम्या को लेडीज कंपार्टमेंट में ले गया और वहां उसका सिर ट्रेन की दीवार में मारकर घायल कर दिया और उसे ट्रेन से बाहर धकेल दिया। बाद में उसने खून से लथपथ सौम्या के साथ बुरी तरह रेप किया था। इसी दौरान उसकी मृत्यु हो गई। काटजू ने कहा था कि मैंने पूरा जजमेंट पड़ा है। जजमेंट में एक गंभीर खामी है। काटजू ने कहा कि सबूतों के आधार पर देखा जाए तो सौम्या के शरीर में दो तरह की चोटें थीं। एक जो ट्रेन के अंदर उसे चोटिल किया गया और दूसरी चोट जो उसे ट्रेन से बाहर फेंकने पर लगी थी। काटजू ने कहा कि सिर्फ पहले सबूत के आधार पर ही आरोपी हत्या का दोषी है। उन्होंने कहा कि मानव शरीर में सिर सबसे महत्वपूर्ण और नाजुक अंग होता है। किसी के सिर में मारने से ही उसकी मौत हो सकती है। काटजू ने अपने ब्लॉग में लिखा था कि सौम्या दुष्कर्म और हत्या मामले में कोर्ट का फैसला गंभीर गलती था। लंबे समय से क़ानूनी जगत में रह रहे न्यायाधीषों से ऐसे फैसले की उम्मीद नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि जस्टिस काटजू व्यक्तिगत रूप से अदालत में आएं और बहस करें कि कानूनी तौर पर वह सही हैं या अदालत। अदालत ने कहा कि पूर्व न्यायाधीश काटजू के प्रति उनके दिल में बहुत सम्मान है और कोर्ट चाहता है कि वे कोर्ट में आएं और खुली अदालत में बहस करें। कोर्ट ने कहा कि वह केरल सरकार और सौम्या की मां की समीक्षा याचिकाओं पर फैसला जस्टिस काटजू से बहस करने के बाद ही करेगी। 
लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने एेसा कदम उठाया क्यों। एक वरिष्ठतम न्यायविद को एक मामले में महज इसलिये बहस के लिए बुलाना कि उन्होंने कोर्ट के आदेश की आलोचना की थी, न्याय और उसकी परंपराओं की कसौटी पर क्या खरा कदम है? सबसे महत्वपूर्ण विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या न्यायपालिका अपनी सीमाओं को लांघ रही है और आवश्यकता से अधिक सक्रिय है? क्या न्यायपालिका सक्रिय होने के लिए मजबूर है? पूरी पृष्ठभूमि को समझे बिना न्यायपालिका की आलोचना उचित नहीं है। हमारे लोकतंत्र में संविधान सर्वोपरि है और संविधान के मूल अधिकार अति महत्वपूर्ण हैं जिसमें अनुच्छेद-14 के अनुसार कोई भी ऐसी नीति या कानून जो मनमाना हो, जो भेदभावपूर्ण हों, वह असंवैधानिक है, अनुच्छेद-21 किसी व्यक्ति को उसके जीवन व दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है, अनुच्छेद-21 वाक् स्वतंत्रता व अभिव्यक्ति स्वतंत्रता, उपजीविका, व्यापार व कारोबार करने की स्वतंत्रता आदि प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त कोई भी कानून संविधान की मुख्य भावना के विरूद्ध नहीं जा सकता है। जब कभी न्यायपालिका के समक्ष शासन की नीतिगत निर्णय या संसद व विधान मण्डल द्वारा बनाये गये कानूनों की संवैधानिकता प्रश्न उठता है, तो न्यायपालिका उन्हें संविधान के विभिन्न प्राविधानों की कसौटी पर परखने के लिए बाध्य है और यदि न्यायपालिका उन्हें खरा नहीं पाती है तो उन्हें असंवैधानिक घोषित उसका दायित्व है। लेकिन काटजू के मामले में यह बात इतनी महत्वपूर्ण नहीं रह जाती। काटजू का लंबा अनुभव है, उन्होंने तमाम बड़े मामलों में निष्पक्षता से फैसले देकर न्याय तंत्र का इकबाल बुलंद किया है। हजारों-लाखों मामलों को नजदीक से देखकर निर्णय करने वाला न्यायविद गलत होगा, यह आसानी से नहीं कहा जा सकता। न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति पीसी पंत और न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित भी वरिष्ठ जज हैं, उन्हें भी निस्संदेह लंबा अनुभव है। इसलिये इस फैसले का अच्छा नतीजा निकलेगा, एेसी पुख्ता संभावनाएं हैं। काटजू यदि पेश हुए तो न्याय पालिका के इतिहास में यह बहस कई दिशाएं देेने वाली सिद्ध होगी। विद्रोही स्वभाव के काटजू पेश होंगे, यह लगता तो है।

Thursday, October 13, 2016

हमें तो याद आएंगे चचे...

मैं आगरा बोल रहा हूं। आजकल दुख में हूं, सही कहूं तो बहुत बुरे दौर में। एक आम-से दिखने वाले इंसान की मौत मुझे मर्माहत कर रही है, भयभीत हूं भविष्य से और उनसे जो इस इंसान के न होने पर मुझे नोच-नोचकर खा जाएंगे। डीके जोशी नहीं रहे, यह सत्यता है लेकिन मैं फिर भी उम्मीद में हूं कि शायद दुनिया से ना हारने वाला यह योद्धा जीतकर लौट आए। मैं जो भी हूं, उन्हीं की वजह से हूं वरना दिन में 12-12 घंटे विद्युत कटौती तो आम थी। मैं वो वीआईपी शहर नहीं था, जो आज हूं।
और मैं... ताजमहल की वजह से दुनिया में विख्यात इस शहर का एक और आम आदमी हूं। करीब ढाई दशक तक आज, अमर उजाला, दैनिक जागरण, आई नेक्स्ट में पत्रकारिता में सक्रिय रहा। आगरा के कई दौर देखे हैं मैंने। ताजमहल है जरूर लेकिन उसकी कोई औकात ही नहीं थी। देश-दुनिया से आते पर्यटक बेहाल होकर लौटते। खुद ताजमहल प्रदूषण की मार से बेहाल था। बिजली के न आने का समय था और न जाने का। कई घंटे तक लगातार कटौती के बाद अचानक बिजली का गुल होना भी यहां आम बात थी। सब-कुछ बेढ़ब, बेहाल। एेसे में डीके जोशी का उदभव हुआ। जोशी तब तक सफाईकर्मियों के नेता थे, एकछत्र। नगर निगम में एेतिहासिक पड़ाव से चर्चित हुए जोशी ने ताजमहल को बचाने की बागडोर संभाली। उनकी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने ताज संरक्षित क्षेत्र प्राधिकरण गठित किया और छह सौ करोड़ का प्रावधान कर दिया। भ्रष्टाचार की घुन लग जाती यदि जोशी नहीं होते। एक भी पैसे का दुरुपयोग होता तो वह चीखने-चिल्लाने लगते। शीर्ष कोर्ट ने मॉनीटरिंग कमेटी बनाई और उन्हें एवं रमन को सदस्य नियुक्त कर दिया। इस दराेगा ने कभी गलत होने नहीं दिया, डीएम-कमिश्नर सब लाइन में। कोई भी इस हाल में नहीं दिखा कि जोशी की बात का विरोध करता। उनके प्रयासों पर कई अहम मसले सुलझे और सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कोर्ट कमिश्नर की तैनाती की। आगरा में लगभग सारे तालाब लील गए बिल्डरों पर उन्होंने कड़ी नजर रखी। हाईकोर्ट तक गए और आदेश कराकर लाए। प्रशासन ढीला नहीं पड़ता तो कई तालाबों पर खड़ीं गगनचुंबी इमारतें धूल में मिल गई होतीं। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण में वह बिल्डरों के गले में फांस बनकर अटके रहे। मामला प्राधिकरण में लंबित है और कड़े आदेश की पूरी संभावना है। इसी तरह झोलाछाप डॉक्टरों का भी उन्होंने ही 'इलाज' किया। मुद्दे तमाम हैं। यह कहूं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आगरा के विकास और उसकी समस्याओं से जुड़े हर मुद्दे में जोशी आगे थे। आगरा के विकास की गाथा जब भी लिखी जाएगी, उनका नाम लिये बिना वो कतई पूरी नहीं होगी।
जोशी आगरा के पत्रकारों में 'चचे' उपनाम से प्रसिद्ध थे। कभी खबरों का टोटा होता, तो हम बेहिचक उन्हें फोन मिलाते, और शानदार खबर हाथ में आ जाती। कभी-कभी तो ब्रेकिंग न्यूज़ की सूचना देकर खुद बुला लेते। मैं उन दिनों दैनिक जागरण में था। अखबार बेशक पुराना था लेकिन खबरों की विश्वसनीयता की दृष्टि से उसे खरा नहीं माना जाता था। यह अखबार का कठिन दौर था। कोई खबर यदि अमर उजाला में छपी होती तो सौ प्रतिशत सत्य मान ली जाती। इस दौर में चचे काम आए। आगरा के विकास की तमाम योजनाओं में भ्रष्टाचार के घुन टटोलने में उन्होंने हमारी टीम की खूब मदद की। हम जब चाहते, वो सीढ़ी चढ़कर दैनिक जागरण कार्यालय आ जाते। हम फाइलें उलटते-पलटते, जो कागज चाहते, ले लेते। चाय की चुस्कियों के बीच चचे बतियाते रहते। हम पूछते, इतना बेखौफ रहते हो, कोई मार देगा। स्कूटर छोड़ दो चचे, सुरक्षा में घूमा करो। तो बिंदास चेहरा खिलखिला उठता। बोलते- मारकर तो देखे कोई, मेरा भूत शमसान में नहीं छोड़ेगा उसे। कभी भी पुराने से स्कूटर पर घूमते दिख जाते। हर अखबार में उनके बराबर के संपर्क थे। कभी किसी खबर में किसी से उन्होंने अन्याय नहीं किया। कोई ब्रेकिंग न्यूज देते, तो शर्त होती कि सभी अखबारों में बांटनी होगी। बात उन दिनों की है जब मैं पुष्प सवेरा का संपादक था, जिसके बिल्डर बीडी अग्रवाल मालिक थे। अग्रवाल और चचे के बीच छत्तीस का आंकड़ा। चचे एेसा बांस थे, जो अग्रवाल तो न दिन में चैन से बैठने देते और न रात को सोने। स्थानीय संपादक सुरेंद्र सिंह ने जोशी और अग्रवाल की मुलाकात की कोशिशें शुरू कीं। अग्रवाल चाहते थे लेकिन जोशी अड़े थे। बमुश्किल इस बात के लिए तैयार हुए कि अखबार के आफिस में आकर इंटरव्यू देंगे। चचे तय समय पर पहुंच गए पर, सिंह ने अग्रवाल को भी बुला लिया। आफिस के बाहर अग्रवाल की कार देखकर चचे बिदक गए। फोन पर बोले, सुरेंद्र सिंह तुमसे बात हुई थी, वादा किया था इसलिये आ गया हूं। बाहर आकर इंटरव्यू करा लो। लाख मनुहार की, चचे अंदर नहीं आए। हम लोग बाहर आए तो जोशी गर्मजोशी से मिले। यह कहते हुए स्कूटर स्टार्ट करके चले गए कि इस जनम में तो इस आदमी से नहीं मिलूंगा। तुम लोग मेरा इंटरव्यू नहीं छाप पाओगे, क्योंकि लाला जो चाहता है, वो मैं करूंगा नहीं। उधर, अग्रवाल के चेहरे पर पराजय के भाव थे। किसी चमचे ने कहा, आप तो परम शक्तिशाली हो, मरवा क्यों नहीं देते इसे। जवाब मिला, कैसे मरवा दूं। यह मर गया तो हंगामा बरप जाएगा। जीते जी मारा जाऊंगा। कई बार कोशिश कर चुका हूं पर एक कदम भी नहीं डिगता। चचे से जुड़े तमाम किस्से हैं, कहानियां हैं। चचे आगरा की सांसों में हैं, स्मृतियों में हैं। उन्हें कोई नहीं भूल सकता, क्योंकि उनके किये काम हर समय उनकी याद दिलाते रहेंगे। हमें तो याद आएंगे चचे।

Thursday, September 15, 2016


'राजगद्दी' के लिए एक मां की जंग

समाजवादी पार्टी में जंग छिड़ी है। सत्तादल के शीर्ष परिवार में मुखिया मुलायम सिंह यादव का बेटा अखिलेश और भाई शिवपाल आमने-सामने हैं। कुछ महीनों की दूरी पर खड़े विधानसभा चुनावों के मद्देनजर छवि सुधारने की कवायद का प्रतिकूल असर हुआ है। लेकिन सारे फसाद की जड़ है क्या, कौन है जो परदे के पीछे खड़ा मुलायम सिंह को रोक रहा है, उन मुलायम सिंह को जो परिवार में किसी भी विवाद पर तत्काल सामने आ जाते थे? दरअसल, जंग खाटी समाजवादी मुलायम सिंह की विरासत और राजनीति के हरे-भरे मैदान में खड़ी नेताजी की 'फसल' पर दावेदारी की है। 'राजगद्दी' पर बैठे 'राम' को हिलाने के लिए 'कैकई' अपने 'भरत' के लिए पूरा जोर लगा रही है। बाहरी अमर सिंह तो महज बहाना हैं। अमर सिंह के साथ जो भी हुआ, वो महज प्रतीकात्मक होगा। हरियाली फसल के बीच खड़े इस 'बिजूके' पर लगा निशाना असल में, कैकई के मंसूबों पर होगा।
सबसे पहले उस वजह की शिनाख्त करते हैं जो इस पूरी लड़ाई की नींव की मानिंद है। 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए टिकट वितरण के दौरान मुलायम सिंह परिवार के एक सदस्य का नाम तेजी से सामने आया और कौतूहल का विषय बन गया। चर्चा फैली कि मुलायम सिंह यानी नेताजी की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता का बेटा प्रतीक उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ से मैदान में उतरने का इच्छुक है। लेकिन अखिलेश बीच में आ गए, प्रतीक को टिकट नहीं मिली लेकिन मुलायम सिंह खुद मैदान में उतर गए। बाद में दो सीटों पर जीते मुलायम के आजमगढ़ सीट छोड़ने को लेकर भी सियासत हुई। मुलायम मैनपुरी का प्रतिनिधित्व बरकरार रखना और आजमगढ़ से प्रतीक को मैदान में उतारना चाहते थे, लेकिन अखिलेश फिर तैयार नहीं हुए। नतीजतन, पार्टी को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलाने वाले परिवार में, जिसमें बेटा पैदा होने पर यह मनन का दौर चलने के व्यग्य लगाए जाने शुरू हो जाते हैं कि उसे लड़ाया किस सीट से जाएगा, प्रतीक घर बैठे रह गए। साधना के लिए यह आघात की तरह था, वह अपने बेटे की राजनीतिक लांचिंग की हसरत दिल में ही दबाए रहने के लिए मजबूर हो गईं। लेकिन संघर्ष के मौजूदा दौर की नींव पड़ गई। इसी बीच गायत्री प्रजापति मंत्री बन गए। अदने से आदमी ने खनन के धंधे से जो बेशुमार दौलत कमाई, उसके पीछे प्रतीक का ही  नाम है। साधना ने कई खेल खेले, आगरा मंडल के एक व्यक्ति को अखिलेश के विरोध के बावजूद मंत्री बनवा दिया। 'खबर' यहां तक उड़ीं कि इसके एवज में करोड़ों रुपये पहुंचाए गए हैं। 
बीपीएल कार्डधारी प्रजापति को राज्यमंत्री बनाया गया। उस वक्त खनन जैसा मालदार महकमा मुख्यमंत्री के अधीन था मगर गायत्री ने साधना और प्रतीक से नजदीकियां बढ़ा लीं। साधना गुप्ता से मुलायम तक सिफारिश कराकर खनन जैसा मालदार महकमा हासिल कर लिया। फिर शुरू करा दिया पूरे यूपी में अवैध रूप से खनन का खेल। हर महीने दो सौ करोड़ की इस काली कमाई का खेल फलने-फूलने लगा। गायत्री ने अपने बेटे और साधना के बेटे प्रतीक यादव को लेकर कई फर्जी कंपनियां बनाकर काली कमाई का निवेश करने लगा। जब गायत्री के दम पर बड़ा बिजनेस एंपायर प्रतीक खड़ा करने में सफल रहे तो मुलायम और पत्नी साधना फूले नहीं समाए। यही वजह रही कि पूरे चार साल तक गायत्री ने लूटपाट मचा कर रख दी। इधर, प्रतीक की स्वीकार्यता के लिए साधना प्रयास करती रहीं, मुलायम मानते भी रहे। अखिलेश भी मन मारकर सब-कुछ बर्दाश्त करते रहे। गायत्री के काले कारनामे अखबारों की सुर्खियां बनते गए। लेकिन अवैध खनन को लेकर सीबीआई का शिकंजा कसने की तैयारियां शुरू होते ही, जैसे अखिलेश को मौका मिल गया। उन्होंने गायत्री प्रजापति को मंत्रिपरिषद से बर्खास्त कर दिया। इससे नेताजी तो जैसे बवंडर में फंस गए। मुख्य सचिव दीपक सिंघल को हटाकर एक वार हो ही चुका था। साधना आपा खो बैठीं। देवर शिवपाल सिंह यादव के भी दोनों चहेते कार्रवाई का शिकार हुए थे तो वो भी साथ आ गए। मोर्चा खोल दिया गया। मुलायम बेबस से सब-कुछ देखते रहे। अमर सिंह 'मंथरा' की भूमिका निभाते रहे। उन्हीं का कंधा इस्तेमाल होता रहा। अखिलेश जानते हैं कि अमर सिंह को ढेर करके वह न केवल शिवपाल को मात देंगे बल्कि साधना भी निशाने का शिकार बन जाएंगी। 
मुलायम की एक खासियत यह है कि वे अपनों की हर तरह से मदद करते हैं। उनकी पहली पत्नी मालती देवी से उनका बड़ा बेटा अखिलेश है। अखिलेश का जन्म 1973 में हुआ था, 2003 में मालती देवी का निधन हो गया। पत्नी के न रहने के बाद नेताजी खुद को बेहद अकेला महसूस करने लगे इसलिए उन्होंने साधना से विवाह कर लिया। इससे पूर्व उनसे 1988 में दूसरा पुत्र प्रतीक पैदा हो चुका था। पहली बार अधिकारिक रुप से लोगों को साधना गुप्ता के उनकी पत्नी होने का तब पता चला जब कि आय के ज्ञात स्रोतों से ज्यादा संपत्ति के मामले में मुलायम ने फरवरी 2007 में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर उन्हें अपनी पत्नी बताया। सारे घटनाक्रम में प्रतीक की पत्नी अपर्णा का भी खासा रोल होना तय है। वह समझदार है, समझती है कि दबाव की राजनीति किए बिना काम नहीं बन सकता। भातखंडे संगीत महाविद्यालय में शास्त्रीय संगीत सीखी यह बहू हर्ष फाउंडेशन नाम के एनजीओ से जुड़ी हुई हैं। उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छता अभियान की तारीफ की। जब प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश के दौरे पर आए तो उनके साथ सेल्फी खिंचवायी। मोदी ने भी उसके विचारों को अपनी साइट पर डाला। गोहत्या पर कड़ी पाबंदी की मांग की।मंहत अवैद्यनाथ का निधन हुआ तो गोरखपुर जाकर योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की। जब किसी ने मोदी की तारीफ करने के बारे में पूछा तो छूटते ही कह दिया कि यह तो मेरे दिल से निकले उदगार है। मैंने यह कहते समय अपने दिमाग का नहीं बल्कि दिल का इस्तेमाल किया है। यह सब बातें ससुरजी को यह संकेत देने के लिए काफी थी कि घर में ‘वीर तुम बढ़े चलो, सामने पहाड़ हो, सिंह की ललकार हो,’ शुरु हो गया इसलिए उन्होंने उसे उत्तर प्रदेश से विधानसभा का चुनाव लड़वाने का फैसला कर लिया। वैसे भी दूसरी पत्नी का दबाव था। जब बड़ी बहू सांसद हो तो छोटी विधायक भी न बने यह कैसे हो सकता है। हालांकि यहां भी अखिलेश ने यथासंभव बाधा पैदा की है, उनके दखल से अपर्णा को लखनऊ की उस सीट से टिकट मिली है जहां से सपा की जीत लगभग असंभव ही है। बहरहाल, परिवार की इस लड़ाई ने समाजवादी पार्टी की राजनीतिक उम्मीदों को खासा नुकसान पहुंचाया है। यह जितने दिन चलेगी, नुकसान उतना ही बढ़ेगा।

Friday, June 3, 2016

धर्म में ढंकी सियासत का काला सच

यह अप्रत्याशित तो कतई नहीं था। मथुरा के जवाहर बाग में हजारों असामाजिक तत्वों की भीड़ के सामने अगर नौसिखियाओं की तरह पुलिस और प्रशासनिक अफसर पहुंचे तो वही हुआ, जो हो सकता था। लेकिन बात इतनी सुलझी भी नहीं... यहां बेशक, पुलिस और भीड़ की भिड़ंत हुई पर, इसकी पटकथा राजनीति के बड़े सूरमा ने लिखी। धर्म के घोल में घुली सियासत ने पुलिस के पहले से ही हाथ-पैर बांध रखे थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्ती और स्थानीय राजनीति के प्रतिदिन के हंगामे के उकसावे ने अनुभवी डीएम-एसएसपी के हाथ-पैर फुला दिए और इतने बड़े कांड की कहानी बन गई। उत्तर प्रदेश में सत्तासीन समाजवादी पार्टी का एक बड़ा चेहरा भी परदे के पीछे है, मात खाया हुआ, पस्त और बेहाल।
मथुरा में हाईवे के आसपास की बेशकीमती जमीनें माफिया की नजरों में हॉटस्पॉट रही हैं, धार्मिक नगरी में धर्म के कारोबारी भी इस मामले में पीछे नहीं। बाबा जयगुरुदेव के अनुयायी भी अक्सर जमीन पर कब्जे के आरोपों में फंसते रहे हैं। इन्हीं अनुयायियों की नजर करीब ढाई सौ एकड़ के जवाहर बाग पर पड़ी, उस समय बाबा के जयगुरूदेव का गोलोकगमन हुआ था। भीतर बिछी चौसर पर उत्तराधिकार को लेकर शह और मात का खेल चल रहा था। बाबा के नजदीकी पंकज यादव यह जंग जीत गए, तमाम दांव-पेच के बावजूद उमाकांत तिवारी हार गए। लेकिन यह बात तब जोर-शोर से उठी थी कि बाबा ने तिवारी का नाम लिया था। कहा था कि कभी भी हम आएंगे, अब वो अपने लिए.. परमार्थ के लिए। नए लोगों के लिए जो नए आएंगे, लेंगे नाम तो ये उमाकांत तिवारी और पुराने जो नामदानी हैं, वो भी ये सम्हाल करते रहेंगे। इसके बाद सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव, उनके अनुज शिवपाल सिंह और पुत्र अखिलेश यादव ने मध्यस्थता की थी। नतीजतन, पंकज यादव के सिर पर ताज सज गया। लेकिन विवाद की कथा लिखनी शुरू हो गई। मथुरा-दिल्ली बाईपास पर सैकड़ों एकड़ भूमि में बने भव्य बाबा जयगुरूदेव नामयोग साधना मंदिर पर यादव समर्थक काबिज हो गए और विरोधी, कुछ समय बाद जवाहर बाग में आकर जम गए। अजूबी मांगों वाले यह लोग खुद को सत्याग्रही बताकर बाग में बसने लगे। कई बार उन्हें हटाने की कोशिश में हंगामे हुए। शासन-सत्ता को खुली चुनौती के बयान सुर्खियां पाते रहे।
ताजा घटनाक्रम में भी सत्ता के दांव-पेच चले हैं। प्रदेश के एक कद्दावर मंत्री की आश्रम पर काबिज समूह से नजदीकियां जगजाहिर हैं। इसी मंत्री की इच्छा पर जिले के पुलिस-प्रशासनिक तंत्र को पर्याप्त मात्रा में फोर्स उपलब्ध नहीं कराया गया। हिंसा में शहीद पुलिस अधीक्षक मुकुल द्विवेदी के मित्र ने खुलकर कहा भी है कि शासन स्तर से पर्याप्त पुलिस फोर्स उपलब्ध कराए जाने को लेकर मुकुल तनाव में चल रहे थे। जिस फोर्स और दम के बूते, वो बाग में घुसे, उससे यह पहले ही तय हो गया था कि मात पुलिस के हिस्से में ही आने वाली है। बताने की जरूरत नहीं कि पुलिस एेसे अभियान स्थानीय अभिसूचना इकाई से हालात का फीडबैक लेने के बाद चलाती है। सेना के साथ अॉपरेशन में सहयोग की रणनीति बनाई पर, एेन वक्त पर सेना को बुलाया ही नहीं गया। जिस जवाहर बाग के एक तरफ जिला मुख्यालय यानी कलक्ट्रेट, दूसरी ओर जिला जेल, तीसरी तरफ सैन्य क्षेत्र और चौथी ओर दिल्ली राजमार्ग है, एेसे संवेदनशील क्षेत्र में खिचड़ी पक जाना स्थानीय खुफिया तंत्र की नाकामी है।
इतनी लापरवाही कैसे हो सकती है कि बाग में हथियारों का जखीरा जमा हो, हैंड ग्रेनेड, फरसे-तलवारें, एके 47 जैसे अस्त्रों-शस्त्रों का जमावड़ा हो और पुलिस जैसे मात्र हाथों में डंडे लेकर पहुंच जाए। शुरुआती दौर में ही फरह थाने के प्रभारी संतोष यादव और एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी के घायल होने के बाद अफरातफरी मच जाना तो एेसा है जैसे बच्चों का कोई खेल हो। आश्चर्य इस बात का भी है कि आगरा परिक्षेत्र के डीआईजी मथुरा जाकर हालात का जायजा लें, रणनीति बनाएं लेकिन अन्य जिलों की फोर्स तक मुहैया कराने की जरूरत न समझी जाए।
सूत्र तो यहां तक कहने से नहीं हिचक रहे कि कद्दावर मंत्री के इशारे पर आला अफसरों ने लापरवाही बरती। यह नेता चाहता है कि नया आश्रम बन जाए और इस बागी गुट का जयगुरुदेव आश्रम पर काबिज गुट के बीच ताकत का संतुलन बना रहे। इस बीच सक्रिय हुए काबिज गुट ने अवैध कब्जेदारों में मतभेद कराकर अपनी घुसपैठ बढ़ा ली। बवाल के बाद ज्यादातर लोगों का मंदिर की तरफ भागना इसी ओर इशारा कर रहा है कि अंदरखाने कुछ और भी पक रहा था। सवाल तो कई हैं जो इन अवैध कब्जाधारियों को सत्ता के संरक्षण का शक पैदा कर रहे हैं। पहला और सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि मात्र दो दिन सत्याग्रह की अनुमति लेने वालों को दो साल तक क्यों जवाहर बाग से नहीं हटाया गया? उन्हें सरकारी दर पर राशन कैसे और किसके इशारे पर मुहैया कराया जाता रहा? बिजली आपूर्ति कैसे चलती रही और तीन बार खराब हुए दो सरकारी नलकूप किसने और क्यों ठीक कराए जबकि उनके लिए किसी बिल का  भुगतान नहीं हो रहा था? धर्म के आवरण में ढंके राजनीति के इस खेल ने पुलिसकर्मियों की बलि ली है, हालांकि लगता अब भी नहीं कि दोषी बेनकाब होंगे। जांच में भी लीपापोती के पक्के आसार हैं क्योंकि जांच मंडलायुक्त स्तर के एक सरकारी अफसर को दी गई है, न कि किसी न्यायिक अधिकारी को। आयुक्त की मजबूरी होगी कि वह सत्ता की मर्जी के माफिक रिपोर्ट तैयार करे। जांच अधिकारी बदला गया है। पहले घोषित आगरा का कमिश्नर सपा के दूसरे प्रभावशाली नेता का करीबी था जो कद्दावर मंत्री से आजकल छत्तीस का आंकड़ा रखते हैं। आगरा के कमिश्नर की जांच कद्दावर मंत्री के गले फंस सकती थी। बहरहाल, इस प्रकरण पर शासन-सत्ता को शर्म तो करनी ही चाहिये।