Thursday, April 5, 2012

गैरजिम्मेदाराना पत्रकारिता की इंतिहा...

सेना के साथ यह क्या हो रहा है, पहले सेनाध्यक्ष का जन्मतिथि का विवाद उठा, फिर ट्रकों की आपूर्ति के आर्डर के एवज में रिश्वत की पेशकश सार्वजनिक हुई और अब तो इतना बड़ा बवंडर मचा है कि सेना की दो टुकड़ियां दिल्ली तक पहुंच गईं। मूवमेंट की खबर तो इस तरह से पेश किया गया कि जैसे दिल्ली का तख्ता पलटने की तैयारियां थीं। क्यों हो रहा है ये सब। सेना की छवि खराब करने की साजिश तो नहीं ये। सेना को अस्त्रों-शस्त्रों की आपूर्ति में खेल खेलने वाले तो देश के सम्मान से खिलवाड़ नहीं कर रहे और लोकतंत्र का अघोषित चौथा स्तंभ उसके हाथों में खिलौना तो नहीं बन रहा। डर बड़ा है और गैर-वाजिब नहीं। एक बार सेना की प्रतिष्ठा धूमिल हुई तो उसके बहुत नुकसान भुगतेंगे हम। सेनाध्यक्ष वीके सिंह ने जब जन्मतिथि विवाद उठाया तो लगा कि एक जनरल अपने लिए लड़ रहा है। इसमें गलत कुछ भी नहीं था। सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचा तब भी कुछ अऩियमित नहीं था, देश की अदालत अपने एक नागरिक के अधिकारों की बात सुन रही थीं। कोर्ट से राहत न मिलने के बाद जनरल इस मुद्दे पर तो शांत हो गए लेकिन सेना को ट्रकों की आपूर्ति करने वाली कंपनी के एजेंट की उन्हें रिश्वत की पेशकश को सार्वजनिक करके नई चर्चाएं छेड़ दीं। सेना में इस तरह के भ्रष्टाचार के मामले पहले भी उजागर हुए हैं। एक सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल का नाम सामने आने से विवाद तूल पकड़ गया। पहली बात यह थी कि सेनाध्यक्ष के पास मामले में कार्रवाई के अधिकार थे, फिर यह बात उन्होंने कार्यकाल के अंतिम दिनों में ही क्यों उजागर की। दूसरी यह कि रक्षामंत्री ने चुप्पी क्यों साधे रखी। यहां भी बात बढ़ गई क्योंकि रक्षामंत्री एके एंटनी बेदाग करियर वाले राजनेता माने जाते हैं और देश के राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस उनके नाम पर विचार कर रही थी। विवादों का इतना बड़ा तूफान उठा कि कुछ ऐसे तत्व भी सक्रिय होने लगे जिनका लक्ष्य कुछ और है। जनरल का कमजोर होना सेना के मनोबल पर असर डालता है। रक्षामंत्री ढुलमुल हैं तो सियासत में उनके विरोधियों के लिए यह फायदा उठाने वाली बात है। सैनिकों का मनोबल गिरना और जनरल के मुंह से निकली बात से यह सिद्ध हो जाना कि सेना के पास अधिकारों की कमी है, पाकिस्तान और चीन जैसे दुश्मनों के लिए बेहद राहत भरी बात है। हम सिर्फ इसलिये चैन की सांस ले सकते हैं कि पाकिस्तान अपने भीतरी झंझटों में फंसा है। चीन में भी इसी वक्त तख्ता पलट की योजना की अटकलें लग रही हैं, इंटरनेट पर शिकंजा कसा गया है यानि चीन भी चैन में नहीं है। सोने पर सुहागा अमेरिका की आतंकी हाफिज सईद पर इनाम की घोषणा से हो गया, पाकिस्तान के समक्ष इससे नई मुश्किल जो पैदा हो गई। ये पड़ोसी तो तमाम और मुश्किलों में भी फंसा हुआ है। प्रधानमंत्री गिलानी कोर्ट की अवमानना के मामले से परेशान हैं और राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के समक्ष सेना आए दिन मुश्किलें खड़ी करती रहती है। लेकिन नई खबर ज्यादा दुखदेय है। हालांकि सरकार को बताए बिना सैनिक टुकड़ियों के दिल्ली कूच करने की रिपोर्ट को सेना और सरकार ने एक सुर में खारिज कर दिया है, जनरल सिंह इसे बेहद मूर्खतापूर्ण बता रहे हैं लेकिन बात खत्म नहीं हो पा रही। इसे एक नजर में खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि यह देश में ताकतवर जगहों पर बैठे खतरनाक तत्वों की साजिश भर है। यह तत्व अब देश की सेना के सम्मान से खेल रहे हैं। फेसबुक, ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर इसे काफी शेयर किया जा रहा है। मीडिया ने कैसे यह लिख दिया कि असंतुष्ट आर्मी चीफ ने सरकार पर दबाव बनाने के लिए सेना की टुकड़ियों को दिल्ली की ओर कूच कराया था। क्या सेना प्रमुख नहीं जानते थे कि 26 जनवरी के मद्देनजर देश की राजधानी में सेना की तमाम टुकड़ियां पहले से हैं। हिसार और आगरा की टुकड़ियां हिंडन या पालम पहुंच रही थीं और यह दोनों ही स्थान सत्ता के सभी प्रमुख केंद्रों के पास नहीं हैं। टुकड़ियां रक्षा सचिव के सक्रिय होने से पहले ही रुक गई थीं, न कि किसी राजा की सेना की तरह विरोधी राजा के दुर्ग के रास्ते में थीं। और तो और... हमारे देश का सत्ता प्रतिष्ठान किसी एक व्यक्ति में निहित नहीं है यानि तख्ता पलट कह देने भर से नहीं हो सकता। जो भी देशप्रेमी है, वह इस खबर से खुश नहीं हो सकता। यह तत्व रक्षा संस्थानों और सरकार के बीच अविश्वास को गहरी खाई में तब्दील करना चाहते हैं। एक ऐसे देश में जहां रक्षा प्रतिष्ठानों पर नागरिकों की चुनी सरकार की सत्ता सुप्रीम है, यह खेल खेला ही नहीं जा सकता। मीडिया इतना गैरजिम्मेदाराना कैसे हो सकता है कि इतने संवेदनशील मुद्दे को इस तरह पेश करे जैसे यह बहुत असामान्य हो। आर्मी और सरकार के बीच विवाद ऐसे स्तर पर पहुंच गया हो, जहां कोई हल मुमकिन नहीं और आर्मी लगभग तख्तापलट के लिए डरा रही है। यह चिंता का विषय है कि क्यों राष्ट्रविरोधी तत्वों ने एक रूटीन अभ्यास को इस तरह पेश किया? दरअसल, अयोग्य सिविल अधिकारियों के लिए यही चिंता का मूल कारण होना चाहिए। सरकार सचमुच गंभीर है तो पूरे प्रकरण को सनसनीखेज बनाने के जिम्मेदार शरारती तत्वों से निपटना उसकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। एक और जो दुर्भाग्यपूर्ण बात सामने आई है जिसमें यह दावा किया जा रहा है कि इस पूरे प्रकरण के पीछे केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री है जो अपने नजदीकी रिश्तेदार के जरिए रक्षा से जुड़े सामानों की खरीद-फरोख्त करने वाली लॉबी से जुड़े हैं। ब्रिटिश अखबार 'द संडे गार्जियन' ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि मंत्री को लगा कि तख्तापलट की आशंका से राजनीतिक बिरादरी आर्मी चीफ के खिलाफ हो जाएगी। उन्हें लगा कि आर्मी चीफ से तनावपूर्ण रिश्ते को देखते हुए प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री खबर पर टिप्पणी नहीं करेंगे और जनरल के विरुद्ध माहौल ज्यादा गर्मा जाएगा परंतु दोनों नेताओं के साथ ही विपक्ष का भी मैदान में आ जाना, उनके लिए झटका साबित हुआ है। हाल के घटनाक्रमों से यह बात सिद्ध हो चुकी है कि हथियारों के सौदागरों का जाल काफी फैला हुआ है। बात भ्रष्टाचार से आगे बढ़ रही है। राष्ट्रभक्त और कर्तव्यनिष्ठ सेना के बारे में बोला जाना बर्दाश्त नहीं हो पा रहा।

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