Sunday, October 13, 2013

नदियों को डंसता प्रदूषण

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंगा-यमुना में मूर्ति विसर्जन पर हटाने से इंकार किया है। प्रदूषण की मार से दम तोड़ रहीं इन नदियों के लिए यह आदेश जीवनदायिनी की तरह है। हाल कितना खराब है, बताने की जरूरत नहीं। उदाहरण के लिए दिल्ली में यमुना महज 22 किमी बहती है किंतु वहां हर सवा किमी पर बहने वाले 18 बड़े नाले उसका दम निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ते। आगरा हो या दिल्ली, पानी को साफ करने के वास्ते जो गिने-चुने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगे हैं, उनमें फिर से गंदे नाले का पानी आ मिलता है। नाले को टैप करने के इंतजाम महज दिखावे के हैं। प्रदूषण रोकने के सरकारी इंतजाम की तो बात ही छोड़िए, हम खुद भी नदियों का बेड़ा गर्क करने से बाज नहीं आ रहे। समस्या इसीलिये तेजी से बढ़ रही है। नदियां हमारे जीवन के साथ ही हमारी संस्कृति और परंपराओं का अंग हैं। ऐसे में प्रदूषण के बढ़ते ग्राफ में हमारी हिस्सेदारी दुर्भाग्य का विषय है। यमुना हिमालय के चंपासागर ग्लेशियर से निकलती है और 1376 किमी का सफर तय करते हुए इलाहाबाद पर गंगा में विलीन हो जाती है। प्रदूषण का हाल सभी जगह खराब है लेकिन दिल्ली में वजीराबाद से ओखला बैराज तक नालों के कूड़ा-कचरे के साथ ही औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले रसायनों से विषैली हो जाती है। जुलाई में हुए एक परीक्षण के मुताबिक, हरियाणा में ताजेवाला बांध में बायोकेमिकल आॅक्सीजन डिमांड यानि बीओडी शून्य है यानि यहां का पानी प्रयोग करने लायक है लेकिन दिल्ली में भीषण प्रदूषण की वजह से बीओडी का स्तर 23 तक पहुंच गया है, जिससे नदी में मछलियां मर जाती हैं और वनस्पतियों की समाप्ति हो जाती है। दिल्ली में यमुना को लोगों ने मृत नदी कहना शुरू कर दिया है। यह हाल तो तब है जबकि 1993 से 2008 तक यमुना की सफाई के लिए केंद्र सरकार ने 13 अरब रुपये खर्च किए हैं। विश्व बैंक जैसी अन्य एजेंसियों ने तो यहां हजारों करोड़ रुपये फूंके हैं। दिल्ली के निजामुद्दीन पुल के नीचे देखने पर पता चलता है कि यमुना की स्थिति कितनी खराब है। पिछले 15 साल में यहां यमुना जल में घुली आॅक्सीजन की मात्रा शून्य के स्तर पर टिकी है। दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में यमुना की स्थिति पर डॉ. विनोद तारे और डॉ. पूर्णेंदु बोस की रिपोर्ट बताती है कि वजीराबाद बैराज के बाद यमुना में जो भी पानी बह रहा है, वह पूरी तरह से सीवेज का पानी है यानि दिल्ली में यमुना नहीं, सिर्फ नाला बहता है। यमुना की जो सूरत दिल्ली में है, कमोवेश वही अन्य शहरों में है। इसी तरह का हाल गंगा का है। इलाहाबाद और वाराणसी जैसे धार्मिक महत्व के शहरों में गंगा का प्रदूषण चरम पर है। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 1985 में बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए 1985 गंगा एक्शन प्लान शुरू करने की घोषणा की थी। इसका पहला चरण 31 मार्च, 2000 को पूरा मान लिया गया और इस पर 462 करोड़ रुपये खर्च हुए। इसके बाद गंगा एक्शन प्लान का दूसरा चरण शुरू हुआ जिसमें यमुना और दूसरी नदियों के एक्शन प्लान भी शामिल कर लिये गए, दिसम्बर 2012 तक इसमें 2598 करोड़ रुपये खर्च हुए। लेकिन हुआ कुछ भी नहीं। संगम सरीखे धार्मिक महत्व के स्थल की बदौलत के बावजूद बीओडी की अधिकतम डिमांड तीन एमजी प्रतिलीटर की तुलना में 11.4 एमजी प्रतिलीटर है। वहीं वाराणसी में बीओडी 14.4 एमजी प्रतिलीटर है। हजारों करोड़ रुपये फूंकने के बाद भी नतीजे आने की कोई उम्मीद नहीं दिखाई देती, वहीं और पैसा खर्च करने के बहाने ढूंढे जा रहे हैं। प्रदूषण की बात ज्यादा उठी, मथुरा-वृंदावन से यमुना प्रदूषण के विरुद्ध उठी आवाज दिल्ली पहुंच गई तो आनन-फानन में एक प्रस्ताव तैयार किया गया और कह दिया गया कि यमुना के प्रदूषण का अगर दिल्ली में इलाज कर दिया जाए तो समस्या का काफी हद तक समाधान हो सकता है। सवाल उठा कि इसमें कितनी राशि खर्च होगी, तो जवाब दिया गया कि 1217 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष के हिसाब से अगले 15 साल में 18 हजार करोड़ रुपये। नदियों के प्रदूषण का बुरा असर भूजल स्तर पर भी हो रहा है। आर्गेनिक केमिस्ट्री में एमएससी ऋषिकेश के 36 वर्षीय आचार्य नीरज ने 2010 में गंगोत्री से गंगासागर तक गंगा की पैदल यात्रा की थी। इस यात्रा के दौरान लगातार गंगा या उसके पास लगे हैंडपपों का पानी पीते रहने से उनके शरीर में आर्सेनिक की मात्रा बढ़ गई। उनके शोध के निष्कर्षों में अंकित है कि किसी भी नदी के पास जमीनी स्तर पर प्रदूषण साफ करने के उपाय कभी लागू नहीं हुए और इसी वजह से गंगा एक्शन प्लान नाकाम हुआ। जाधवपुर विवि के प्रो. दीपंकर चक्रवर्ती के 15 वर्ष लम्बे शोध में पता चला कि पटना, बलिया, बनारस, इलाहाबाद, कानपुर तक नदी किनारे आॅर्सेनिक की मात्रा चरम स्थिति में है। यमुना में दिल्ली के पास गढ़ मुक्तेश्वर तक आॅर्सेनिक की पुष्टि हुई है। अब अगर मूर्तियों के विसर्जन से प्रदूषण की स्थिति की बात की जाए तो स्थिति और भी गंभीर नजर आने लगेगी। नदी में हजारों मूर्तियों के विसर्जन के दौरान पूजा सामग्री, पॉलीथिन बैग, फोम, फूल, खाद्य सामग्री, साज-सज्जा का सामान, मेटल पॉलिश, प्लास्टिक शीट, कॉस्मेटिक का सामान डाला जाता है, जो प्रदूषण का हाल और बिगाड़ देता है। मूर्ति विसर्जन से पानी की चालकता पीएच, ठोस पदार्थों की मौजूदगी, बीओडी और घुलनशील आक्सीजन (डीओ) में कमी बढ़ जाती है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्ययन के मुताबिक सामान्य समय में यमुना के पानी में पारे की मात्रा लगभग नहीं के बराबर होती है, लेकिन धार्मिक उत्सवों के दौरान यह अचानक बढ़ जाती है। यहा तक कि क्रोमियम, तांबा, निकल, जस्ता, लोहा और आर्सेनिक जैसी भारी धातुओं का पानी में अनुपात भी बढ़ जाता है। हम यह क्यों नहीं समझते कि समय के साथ परंपराएं भी बदली जानी चाहिये, यदि वह भीषण संकट की दस्तक दे रही हों। नदियां दूषित हो रही हैं। सूख रही हैं, जहां पानी है, वहां वेग नहीं है जो तमाम प्रदूषण को बहाकर ले जा सके। जरूरत किसी वैकल्पिक व्यवस्था की है जिससे परंपरा भी निभ जाएं और नदियों की जान भी बच जाए। आस्था के नाम पर अड़ियल रवैये से अब काम नहीं चलने वाला वरना भावी पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।

1 comment:

Dr. Madan Mohan Sharma said...

This is an astonishing piece portraying the sordid and horrendous state of rivers. The callousness of politicians and abuse of funds allocated is responsible for continuous deterioration of rivers, poisoning of water and above all endangering lives of millions of people. Undoubtedly, India is going to become cancer capital of the world due to such factors. Strong legislation and its implementation become paramount to save rivers and people of India. Moreover, movements to protect rivers and to help implement legislation are required.