Monday, March 4, 2013

उद्धव का एक दांव

महाराष्ट्र में सियासत चुनावी मोड़ का रास्ता पकड़ रही है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना सुप्रीमो राज ठाकरे के काफिले पर केंद्रीय मंत्री शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के कार्यकतार्ओं के हमले की प्रतिक्रिया में जिस तरह शिवसेना ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी की, उससे हिंदूवादी दोनों दलों के नजदीक आने की संभावनाएं फिर बढ़ी हैं। शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने न केवल घटना की निंदा में तत्परता दिखाई बल्कि समय गंवाए बगैर जिस तरह वह पार्टी मुख्यालय पहुंच गए और अपने कार्यकर्ताओं की बैठक ली। नजदीकियां बढ़ने से कांग्रेस खेमे में बेचैनी ज्यादा है। उसे उम्मीद थी कि सियासत की हवाएं उसके पक्ष में हो रही हैं और चुनावों के नतीजे केंद्रीय सत्ता में पवार पर उसकी अनिवार्यता समाप्त कर देंगे। हालांकि इसे उद्धव की राजनीतिक चाल के रूप में भी देखा जा रहा है जो राज की बार-बार जरूरत बताने के विरुद्ध है। बाल ठाकरे के निधन के बाद उद्धव और राज ठाकरे में दोस्ती की कई बार खबरें आम हुई हैं। उद्धव ज्यादा सक्रिय दिख रहे हैं। राज ठाकरे के संबंधों को लेकर जब वह पहली बार सार्वजनिक रूप से बोले तो राज ठाकरे के लिए राजनीतिक दरवाजा खोलने का संकेत छिपा था। लेकिन यह बयान यूं ही अचानक नहीं आ गया। बड़े ठाकरे के निधन से पहले और बाद में राज ठाकरे की उनके आवास मातोश्री में प्रवेश को भविष्य की राजनीति के तहत मशक्कत के रूप में प्रचारित किया गया था। खबर खूब उड़ी थी कि शिवसेना के कुछ लोग दोनों भाइयों को करीब नहीं आने देना चाहते। उद्धव के निजी सचिव नीलेश कुलकर्णी का नाम तो खुलकर प्रचारित हुआ था। उद्धव ने अपने साक्षात्कार में इसी का जवाब यह कहकर दिया कि शिवसेना में कोई उनके निर्णयों को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं है। यह स्पष्ट तौर पर उन करीबियों को संकेत था जो बाल ठाकरे के निधन के बाद प्रभावशाली ध्रुव बनकर उभरे हैं और कार्यकर्ताओं की भीड़ उनके पीछे जुटने से उद्धव को मुश्किलें महसूस हो रही हैं। हालांकि मूल सवाल यही है कि क्या वास्तव में राज और उद्धव राजनीतिक गठजोड़ की संभावना तलाशने में जुटे हैं। राजनीति का कुछ भी निश्चित या अनिश्चित न होने का स्वभाव है और ऐसे में कोई संभावना से इंकार नहीं कर सकता कि राज ठाकरे और उद्धव एक राजनीतिक गठजोड़ कायम कर सकते हैं। वैसे भी, राज न तो खुद ही शिवसेना में शामिल होने का इरादा रखते हैं और न ही शिवसेना के भीतर उन्हें शामिल कराने की कोई जल्दबाजी मची है। राज का अपना स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व बन चुका है और उद्धव के लिए उनके पिता की विरासत को संभालने की जिम्मेदारी मिली हुई है। ऐसी स्थिति में दोनों ही अपने रास्ते आगे बढ़ने में विश्वास करते हैं। हां, इस बात की संभावना जरूर विकसित की जा रही है कि महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को उस राजनीतिक युति में शामिल कर लिया जाए जिसमें अभी भाजपा, शिवसेना और आरपीआई एक साथ हैं। पहल भाजपा की ओर से हुई है लेकिन उद्धव भी साथ हैं। भाजपा की रणनीति में दम है, दोनों दलों के भी गठबंधन में शामिल होने से उसके राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सीटों में बड़ी वृद्धि होना लगभग तय ही है। राज ठाकरे ने अपना वोट बैंक बना लिया है, इसके साथ ही उन कार्यकर्ताओं की भीड़ उनके साथ है जो पुराने शिवसैनिक हैं और उद्धव के बजाए उनके समर्थक थे। अकेली मुंबई की ही बात करें तो वहां भी कई इलाकों में शिवसेना के बजाए राज की पार्टी का दबदबा बन चुका है। कमोवेश, यही स्थिति महाराष्ट्र के कई क्षेत्रों में है। राजनाथ सिंह के भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद प्रभावशाली हुई प्रदेश इकाई की एक लॉबी भी इस प्रयास में जुटी है। दरअसल, राजनाथ समेत इस लॉबी के नेताओं को बाल ठाकरे के बाद राज ठाकरे में ही वह करिश्मा दिख रहा है जो उनके लिए महाराष्ट्र में वोटों का थोक इंतजाम कर सकता है। हालांकि यह इतना आसान भी नहीं। महाराष्ट्र की राजनीति के जानकारों को लगता है कि उद्धव ठाकरे का यह बयान कि ह्यताली एक हाथ से नहीं बजती। बजती है क्या? एकता का सवाल दोनों से एक साथ पूछा जाना चाहिये क्योंकि यह जवाब तो दोनों को ही देना होगाह्ण, सोच-समझकर दिया गया है। मकसद इतना है कि संभावनाओं पर उठने वाले हर प्रश्न को शिवसेना के पाले से निकालकर मनसे की तरफ फेंक दिया जाए। शिवसेना के सियासी सिस्टम को करीब से देखने से पता चलता है कि पार्टी के भीतर राज ठाकरे की अहमियत और जरूरत उतनी है नहीं, जितनी बाहर प्रचारित की जाती है परंतु बार-बार उठने वाले सवालों से सीधे तौर पर शिवेसना को नुकसान होता है और राज को लाभ। लोग समझने लगते हैं कि उम्दा सियासी कौशल की वजह से उनकी इतनी पूछ है। गेंद राज ठाकरे की तरफ उछालकर शिवसेना इस तर्क के बोझ से बरी हो जाती है उसकी ओर से कोई पहल नहीं की गई। इसके पीछे उसके सियासी फायदा भी है। वह न केवल संभावित क्षति से बचती है बल्कि कार्यकर्ताओं की मनसे की ओर भगदड़ की आशंकाओं को विराम लग जाता है। साथ ही, उद्धव उन सहयोगियों को भी रोक पाने में सक्षम हो जाते हैं जो राज में शिवसेना का विकल्प ढूंढ रहे हैं। इसी क्रम में पार्टी के नेता यह कहने में पूरा जोर लगा रहे हैं कि शिवसेना राजनीति में राष्ट्रवादी दृष्टिकोण की पार्टी बन चुकी है और भाजपा मनसे के वर्तमान स्वरूप से इत्तेफाक नहीं रखती। जाहिर है, आपत्ति मराठावाद यानि एक प्रकार के क्षेत्रवाद से हैै। यह क्षेत्रवाद यदि भाजपा को स्वीकार हो भी जाता है तो उसे राष्ट्रीय स्तर पर धक्का लगेगा। बावजूद इसके, अगर भाजपा मनसे को मिलाने के प्रयास जारी रखती है तो शिवसेना के पास यह कहने का मौका होगा कि उसने तो कभी इस पर आपत्ति ही नहीं की। मराठी माणुस की राजनीति को बांटने का दोष राज के सिर मढ़कर उद्धव ने ऊपरी तौर पर भले ही राज ठाकरे से मिलन की संभावनाओं को जन्म दे दिया हो लेकिन ऐसा करके वह राजनीति में नौसिखिया होने का आरोप झूठा सिद्ध करने में सफल सिद्ध हो रहे हैं। शिवसेना विरोधी दल यह कहकर उनकी बात को बेशक, गंभीरता से नहीं लें कि यह सूझबूझ से भरी चाल है जिसमें राज के साथ-साथ सहयोगी भारतीय जनता पार्टी को भी उलझाने का प्रयास किया गया है। ऐसी स्थिति में उद्धव जो चाहते हैं, वह कर पाने में सफल रहे हैं।

Wednesday, February 20, 2013

कुम्हलाता बचपन

आगरा में थाना एत्माद्दौला क्षेत्र में सातवीं कक्षा की छात्रा सुरभि (बदला हुआ नाम) के प्राइवेट ट्यूयर ने घर पर ही यौन उत्पीड़न किया। सिलसिला दो साल तक चलता रहा। वह नौवीं कक्षा में आई, ट्यूटर बदल गया। जो दूसरा ट्यूटर लगाया गया उसने भी वही बदतमीजी दोहराई। दूसरे ट्यूटर का शब्दजाल इतना मोहित कर देने वाला था कि निधि को न चाहते हुए भी उससे प्यार हो गया। यह क्रम भी करीब दो साल चला। दूसरा ट्यूटर शादीशुदा और तीन बच्चों का बाप था। वो नाबालिग ममता को घर से भगा ले गया। ममता अपने इस 15 साल बड़े पति के साथ रह रही है जबकि उसने पहली पत्नी और तीन बच्चों को मामूली गुजारा भत्ता देकर उनके हाल पर छोड़ दिया है। बाल यौन उत्पीड़न की शिकायत समय से न होने से एक परिवार और एक बच्ची का जीवन अंधकारमय हो गया है। बचपन कुम्हला रहा है, उसके अपने भी उसे कुचलने में पीछे नहीं। मशहूर सितार वादक स्वर्गीय पंडित रविशंकर की बेटी अनुष्का शंकर ने खुलासा किया कि जब वो छोटी थीं तो उनका यौन शोषण हुआ था। बात अकेली अनुष्का की नहीं है, हालात बहुत खराब हैं और पूरी दुनिया में ऐसे मामले सामने आए हैं। हॉलीवुड स्टार सोफिया हयात ने भी कहा है कि 10 साल की उम्र में उनका यौन शोषण किया गया था। बच्चों का यौन शोषण एक डरावना सच है और अधिकांश लोग इसके विस्तार से अनजान हैं। शोध बताते हैं कि 53 प्रतिशत या प्रत्येक दो में से एक बच्चा बाल यौन शोषण का शिकार है। सामान्य धारणा के विपरीत, घर बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित जगह नहीं हैं, क्योंकि अधिकांश दुर्व्यवहारी परिवार के विश्वासी होते हैं। तो फिर हल क्या है, दुर्व्यवहार को मना कर सकने के साहस के लिए बच्चों को प्रशिक्षित तथा प्रोत्साहित करने के साथ साथ अभिभावकों को भी उनके संकेतों के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत है। इसके अतिरिक्त बच्चों की सुरक्षा तथा अपराधियों को सख्ती के साथ दण्डित करने के लिए बाल यौन शोषण के खिलाफ विशेष एवं ठोस कानून की आवश्यकता है। सर्वाधिक बाल यौन शोषण का देश मौजूदा हालात ने भारत को दुनिया में सबसे ज्यादा यौन शोषित बच्चों का देश बना दिया है। बाल यौन शोषण के आंकड़ों का चित्र बेहद वीभत्स कर देने वाला है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 53 फीसदी से ज्यादा बच्चों को अपने वयस्क होने तक बाल यौन शोषण के हालातों का सामना करना पड़ता है। केंद्रीय महिला एंव बाल विकास मंत्रालय’ के लिए हुए एक सर्वेक्षण से सामने आए हैं। पता चला कि विभिन्न प्रकार के शोषण में पांच से 12 वर्ष तक की उम्र के छोटे बच्चे शोषण और दुर्व्यवहार के सबसे अधिक शिकार होते हैं तथा इन पर खतरा भी सबसे अधिक होता है। इन शोषणों में शारीरिक, यौन और भावनात्मक शोषण शामिल होता है। --- हरेक तीन में से दो बच्चे शारीरिक शोषण के शिकार बने। --- शारीरिक रूप से शोषित 69 प्रतिशत बच्चों में 54.68 प्रतिशत लड़के थे। --- 50 प्रतिशत से अधिक बच्चे किसी न किसी प्रकार के शारीरिक शोषण के शिकार थे। --- पारिवारिक स्थिति में शारीरिक रूप से शोषित बच्चों में 88.6 प्रतिशत का शारीरिक शोषण माता-पिता ने किया। --- आंध्र प्रदेश, असम, बिहार और दिल्ली से अन्य राज्यों की तुलना में सभी प्रकार के शोषणों के अधिक मामले सामने आये। --- 50.2 प्रतिशत बच्चे सप्ताह के सात दिन काम करते हैं। ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार परामर्श समूह न्यूयॉर्क के ह्यूमन राइट्स वॉच ने ताजा रिपोर्ट में कहा, बेशक 16 दिसम्बर को दिल्ली में गैंगरेप की घटना और तत्पश्चात जनता के आक्रोश के चलते भारत में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा को लेकर काफी जागरूकता आई, लेकिन, ‘बाल-उत्पीड़न की समस्या के बारे में जानकारी काफी कम है।’ रिपोर्ट में कुछ चौंकाने वाले आंकड़े उजागर किए गए हैं। रिपोर्ट में भारत के 13 राज्यों के 12,500 बच्चों पर किए सरकारी सर्वेक्षण का हवाला दिया गया। इस सर्वेक्षण में पाया गया कि जवाब देने वाले आधे बच्चों ने कहा कि उन्होंने किसी ना किसी प्रकार का यौन उत्पीड़न अनुभव किया है। समस्या के विस्तार के बारे में जानकारी नहीं है, लेकिन अगर ये आंकड़े कोई गाइड हैं, तो कदाचित इस समस्या का स्तर काफी व्यापक है। भारत में करीब चार अरब तीस करोड़ बच्चे हैं, जो उसकी कुल आबादी का एक-तिहाई हैं। विश्व की बाल आबादी का ये करीब पांचवा हिस्सा हैं। रिपोर्ट में इंगित किया गया है, भारत में हर जगह बच्चे यौन-उत्पीड़न के विभिन्न प्रकारों को सहते हैं-अपने घरों के भीतर, सड़कों पर, स्कूलों में, अनाथालयों में और संरक्षण गृहों में। रिपोर्ट बाल उत्पीड़न के शिकार बच्चों, उनके नातेदारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, सरकारी अधिकारियों और अन्य हितधारकों के 100 से ज्यादा साक्षात्कारों पर आधारित है। क्या है बाल उत्पीड़न संयुक्त राष्ट्र बाल उत्पीड़न की जो परिभाषा दी है, उसके अनुसार, एक बच्चे और उम्रदराज़ अथवा ज्यादा समझदार बच्चे अथवा वयस्क के बीच संपर्क अथवा बातचीत (अजनबी, सहोदर अथवा अधिकार प्राप्त शख्स, जैसे अभिभावक अथवा देखभाल करने वाला), के दौरान जब बच्चे का इस्तेमाल एक उम्रदराज़ बच्चे अथवा वयस्क द्वारा यौन संतुष्टि के लिए वस्तु के तौर पर किया जाए। बच्चे से ये संपर्क अथवा बातचीत ज़ोर-जबर्दस्ती, छल-कपट, लोभ, धमकी अथवा दबाव में की जाए। वास्तव में, बाल-उत्पीड़न में बाल-यौन अंगों का दुरुपयोग, वयस्कों द्वारा बाल-यौन शोषण, अश्लील बाल चित्र या लेखन और बलात्कार शामिल होंगे। बाल यौन व्यापार के बने अड्डे दिलचस्प तथ्य ये है कि शोषण धार्मिक-पर्यटक स्थलों पर अधिक है। शोषण करने वाले विदेशी और घरेलू पर्यटकों के साथ-साथ स्थानीय निवासी होते हैं। ये शोषण लगभग छह साल की उम्र से शुरू हो जाता है और जब बालक नौ साल की उम्र के होते हैं तो उन्होंने पूरी तरह से इस काम में लगा दिया जाता है। ऐसे तत्थ तब और उजागर हो गए जब एक ऑस्ट्रेलियाई नागरिक को पुरी में बालकों के यौन शोषण के मामले में गिरफ्तार किया गया। आंकडे बताते हैं कि ऐसी घटनाएं कम संख्या में नहीं हैं। कई विदेशी पर्यटक किसी एक स्थान पर लंबे समय तक रहते हैं और वे बच्चों और उनके परिवारों से दोस्ती गांठ लेते हैं और उसके बाद उनका शोषण करते हैं। कभी-कभी परिजनों ने ही बालकों का शोषण किया होता है और बाद में वो उन्हें इसके लिए मजबूर कर देते हैं। कई शहरों में बाल सेक्स पर्यटन जोरों से चल रहा है। मामलों से स्पष्ट है कि विदेशी पर्यटकों ने नगद राशि या उपहारों का प्रस्ताव देकर बच्चों का यौन शोषण किया। जिस तेजी से विदेशों में गे-समुदाय की वृद्धि हुई है उससे भारत में आने वाले विदेशियों में 10 से 16 साल तक के लड़कों की मांग में बढ़ोतरी हुई है। गैरसरकारी संगठन आई आन क्राइम के मुताबिक, देश के विभिन्न थानों में हर महीने लगभग सात हजार के लगभग बच्चों की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई जाती है। इनमें से हर साल करीब 23 हजार बच्चों का कोई अता-पता नहीं चल पाता जिन्हें अमूमन मृत ही समझा जाता है। भारत में सही तौर पर बाल यौन व्यापार में धकेले जा रहे बच्चों की कोई सही संख्या उपलब्ध नहीं है, जबकि भारत सबसे बड़ा केंद्र है बाल यौन व्यापार का। शोषण रोकने के उपाय बाल संरक्षण के लिए तमाम व्यवस्थाएं हैं, जैसा कि एक दशक पहले पारित हुआ एक जुविनाइल जस्टिस कानून। यह कानून 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को सुरक्षा और संरक्षण प्रदान करता है। कानून के तहत बाल-कल्याण कमेटियों और जुविनाइल-न्यायिक बोर्ड का गठन किया गया, जो दुर्व्यवहार के जोखिम में रह रहे अथवा प्राधिकार के साथ समस्याग्रस्त बच्चों की देखभाल करता है। संसद ने मई 2012 को यौन-अपराध बाल संरक्षण अधिनियम पारित किया, जिसके तहत बाल-उत्पीड़न के सभी प्रकारों को पहली बार देश में विशिष्ट अपराध बनाया गया। ऊंचे परिवारों में मामले ज्यादा आम धारणा के विपरीत भारत में उच्च और मध्यम आय वर्ग के परिवारों में बच्चों का यौन शोषण निम्न वर्ग के मुकाबले कहीं अधिक है। बच्चों के यौन शोषण के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाने वाली एक स्वंयसेवी संस्था ‘आलोचना’ की संयोजक भारती कोतवाल कहती हैं, उच्च और मध्यम आय वर्ग के परिवारों में बच्चों का यौन शोषण कहीं ज्यादा है, लेकिन लिंग भेद और सामाजिक दबाव के चलते यह मामले सामने नहीं आते। दक्षिण कोरिया सबसे सख्त बाल यौन शोषण रोकने की दिशा में सर्वाधिक सख्ती दक्षिण कोरिया ने दिखाई है। वह अब सीरियल बाल यौन शोषण के दोषी को सजा देने के लिए रसायनों का उपयोग करेगा। इस रसायन के इंजेक्शन से व्यक्ति का बंध्याकरण किया जाएगा। पहली सजा 45 वर्षीय दोषी व्यक्ति को मिली, उसे जुलाई में जेल से रिहा कर दिया जाएगा लेकिन प्रत्येक तीन साल तक उसे तीन माह पर इंजेक्शन दिया जाएगा। व्यक्ति 13 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों का यौन शोषण करने और उनका बलात्कार करने का दोषी पाया गया है। वर्ष 2010 में दक्षिण कोरिया ने रसायनों का उपयोग कर बंध्याकरण को कानूनी दर्जा दे दिया।

Monday, February 11, 2013

सियासत में जिंदा अफ़जल गुरु

संसद भवन पर हमले का मुख्य साजिशकर्ता अफजल गुरु अब अतीत की बात है लेकिन सियासत के गलियारों की चर्चाओं में वह जिंदा है। उस पर चर्चाएं थम नहीं रहीं। बार-बार यह कहकर खुद को देशवासी सिद्ध करने की होड़ के दिन शायद लद गए हैं कि आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता, वह देश और समाज का दुश्मन होता है। अफजल को फांसी पर लटकाए जाने के बाद गोलबंदी का दौर तेजी पर है। यह साबित करने में कुछ प्रभावशाली नेता कसर बाकी नहीं छोड़ रहे कि केंद्र सरकार ने गलत फैसला किया। दुर्भाग्य की बात तो यह है कि विरोधियों में एक आवाज एक सूबे के सीएम की भी है और भारत में आतंकवाद का पोषण करने वाले पाकिस्तान की वजह से यह सूबा अशांत है। हालांकि यह उनकी सियासी मजबूरी भी है। वहीं सत्तासीन पार्टी और मुख्य विपक्षी दल 'अफजल प्रलाप' में एक-दूसरे को पीछे छोड़ने में कोई कसर बाकी नहीं रख रही। अलगाववादी कश्मीरी नेता यासीन मलिक के साथ भारत के मोस्ट वांटेड आतंकी सरगना हाफिज सईद की जुगलबंदी से केंद्र ने मामले में कूटनीतिक मात जरूर खाई है। पाकिस्तान ने फांसी पर टिप्पणी तो संयमित की लेकिन अंदरखाने यह साजिश रची है। अफजल गुरु को फांसी की सजा लंबे समय से राजनीतिक मुद्दा रही है। सबसे ज्यादा चर्चाएं जम्मू-कश्मीर में हुई हैं जहां आतंकवाद समूल नष्ट नहीं हुआ है और अलगाववादी ताकतें आए दिन कुछ न कुछ करतूतें कर दिया करती हैं। सत्तारूढ़ नेशनल कांफ्रेंस के आला नेता फारुख अब्दुल्ला के केंद्र सरकार में मंत्री और सहयोगी दल होने की वजह से कांग्रेस दबाव में थी कि अफजल को फांसी पर फैसला टाला जाता रहे। भारतीय जनता पार्टी अक्सर तत्काल फांसी की मांग उठाकर सरकार का सिरदर्द बढ़ाती रहती थी। यही नहीं उसकी मंशा आगामी लोकसभा चुनाव में इसे मुद्दा बनाने की भी थी। मुख्य विपक्षी दल में चूंकि उन नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए चल रहा है जिनकी छवि कट्टर हिंदूवादी की है इसलिये कांग्रेस महसूस करने लगी थी कि अफजल समेत आतंकियों को फांसी न देने का मुद्दा उसके गले की फांस बनने जा रहा है। इसके साथ ही, सरकार ने शायद ये सोचा हो कि पिछले एक साल से कश्मीर में स्थिति शांतिपूर्ण रही है और लोगों का प्रतिरोध कम हो गया है। विरोध की अगुवाई संभाल रहे जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला केंद्र सरकार को चुनौती देते हैं कि वह साबित करे कि अफजल को फांसी दिया जाना सियासी फैसला नहीं था। फांसी विरोधी कहते हैं कि अफजल के साथ न्याय नहीं हुआ और उसे फांसी पारिस्थितिजन्य प्रमाणों के आधार पर दी गई न कि सुबूतों की बिना पर। अफजल को अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया, उन्हें उचित मौकों पर वकील नहीं दिया गया और पूरे मामले में कई बातें गुप्त रखी गर्इं। आरोप यह भी है कि उनके खिलाफ मिले दिल्ली पुलिस की आतंक-विरोधी शाखा स्पेशल सेल ने ढीले-ढाले सुबूत पेश किए। उमर का रवैया दरअसल, राजनीतिक समीकरणों की वजह से भी है। कश्मीर में एक दशक में हालात तेजी से सुधरे हैं। उग्रवाद कमजोर हुआ है और घाटी की राजनीति देश की मुख्यधारा में शामिल हुई है। पूरी दुनिया में यह संकेत गया है कि कश्मीर में मजबूत लोकतंत्र की वापसी हो चुकी है। ऐसे में अफजल की फांसी का पाकिस्तान परस्त आतंकवादी दुरुपयोग कर सकते हैं, जनता को भड़का सकते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या पहले हुई, उनके हत्यारों का दोष पहले सिद्ध हुआ पर फांसी पर उनसे पहले अफजल गुरु को लटका दिया गया। इस तर्क की काट उमर के पास नहीं है और विपक्षी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की नेता महबूबा मुफ्ती हमलावर रहकर उनकी मुश्किलें बढ़ा रही हैं। ऐसे में उमर अब्दुल्ला की सबसे बड़ी चुनौती उग्रवादियों के मंसूबों पर रोकथाम लगाना है। कश्मीर में गुरु को प्रतीक के तौर पर पेश कर भारत विरोधी माहौल बनाने का षड्यंत्र हो सकता है। उमर इस हालात से निपटने के लिए अपनी दलीलें दे रहे हैं और खुद को यूपीए से अलग दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। वह जताना चाहते हैं कि उन्हें लोगों की भावनाओं की समझ है। फांसी से कश्मीर के तमाम अन्य समीकरण भी गड़बड़ा गए हैं। भारत और कश्मीरी अलगाववादियों के बीच वार्ता की सम्भावनाओं पर प्रश्नचिह्न लग गए हैं। पृथकतावादी नेता मीरवाइज उमर फारुक ने कहा भी है कि अफजल की फांसी के बाद नई दिल्ली के साथ पुन: वार्ता के आसार समाप्त हो गए हैं क्योंकि कश्मीरी नौजवानों के बीच भारत के खिलाफ नफरत बढ़ेगी। खून-खराबे के दूसरे दौर की शुरुआत भी हो सकती है। हालांकि नए राजनीतिक हालात में मीरवाइज की हुर्रियत कांफ्रेंस अप्रासंगिक हुई है और सामने आर्इं नई ताकतें अलग जुबान में बोलने लगी हैं। मजहबी चरमपंथी और भारत विरोधी गुट साथ-साथ आने की तैयारी करते नजर आ रहे हैं। केंद्र स्तर पर भी फांसी का मुद्दा राजनीतिक समीकरणों में बदलाव की वजह बनने जा रहे हैं। कांग्रेस को तात्कालिक लाभ 21 फरवरी से शुरू हो रहे संसद के बजट सत्र में मिलने जा रहा है। अगले वर्ष लोकसभा के चुनाव प्रस्तावित हैं और सरकार पर कांग्रेस का दबाव है कि वह लोक हित के फैसले करे। जनलुभावन बजट प्रस्तुत करे और महंगाई कम करने के ठोस उपाय सामने लाए। अफजल की फांसी से उत्साहित कांग्रेस मौका न गंवाते हुए राष्ट्रपति के अभिभाषण में अपनी उपलब्धियों का बखान कर सकती है। जयपुर चिंतन बैठक में तय हुआ था कि विपक्ष जिन-जिन संभावित मुद्दों पर आने वाले चुनावों में कांग्रेस को घेर सकता है, उन मुद्दों का हल निकालकर विपक्ष को नए मुद्दे खोजने में ही मजबूर कर दिया जाए। भाजपा चूंकि गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे के हिंदू आतंकवाद के बयान पर संसद में हो-हल्ले की तैयारी में थी इसलिये हो सकता है कि अफजल की सजा पर अमल भी विपक्ष के तरकश के सभी तीरों को खत्म कर देने के प्रयास के तहत किया गया हो। भगवा आतंकवाद का मुद्दा छाया हुआ है, ऐसे में अफजल की फांसी पर अमल कर सभी तरह के आतंकवाद को समान रूप से देखने का दावा भी कांग्रेस अब कर सकती है। उग्रवाद पर ढीला रवैया अपनाने का जो आरोप उस पर लगता रहा है, वह भी इस फैसले से कमजोर पड़ा है। कांग्रेस कहने लगी है कि राष्ट्रपति की ओर से अफजल गुरु की दया याचिका खारिज करने के तुरंत बाद फांसी संबंधी आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए गए। दूसरी तरफ, भाजपा फांसी में लगी देरी को मुद्दा बना रही है। कांग्रेस फांसी का लाभ उठाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहती, जबकि भाजपा की कोशिश श्रेय नकारने की है। यह बात तो लगभग तय ही है कि आने वाले समय में यह मुद्दा खासा गुल खिलाने जा रहा है।

Sunday, February 3, 2013

मोदी की तरफ बढ़ती भाजपा

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में बेचैनी का दौर है। नेतृत्व कर रही भारतीय जनता पार्टी ने जबसे राजनाथ सिंह को अपनी कमान सौंपी है और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी लम्बी मुलाकात हुई है, तब से घटक दल यह सोचकर बेहाल हुए जा रहे हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव में उसका मुखौटा कौन होगा। भाजपा मोदी को लोकसभा चुनाव का मुख्य चेहरा बनाने को लगभग तैयार दिखती है और मोदी तमाम दलों के गले नहीं उतरते, उन्हें लगता है कि मोदी यदि प्रधानमंत्री पद के दावेदार घोषित हुए तो उसके अल्पसंख्यक मत अन्य दलों की ओर खिसक सकते हैं। सीधी सी समस्या है, मुस्लिम वोट सरकने से उनकी सीटें कम हो जाएंगी और वह सत्ता मिलने की स्थिति में सौदेबाजी के काबिल भी नहीं बचेंगे। जनता दल यूनाइटेड नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, अन्ना द्रमुक सुप्रीमो और तमिलनाडु की सीएम जयललिता के साथ ही तमाम चेहरे ऐसे हैं जो पीएम बनने का सपना पाले बैठे हैं, मोदी की आक्रामकता और सीटों में कमी उनके सपनों के छितरने का कारण बन सकती है। शिवसेना का रुख भी मोदी की राह का कांटा बना है। इसीलिये उन्हें खुलकर मैदान में उतारने में हिचक है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की इच्छा नितिन गडकरी को दोबारा भाजपा अध्यक्ष के रूप में देखने की थी लेकिन वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के वीटो ने खेल बिगाड़ दिया। मजबूरी में राजनाथ सिंह का चुनाव हुआ। यह क्षत्रिय नेता अपने पूर्ववर्ती के कार्यकाल में प्रभावशाली और गडकरी के निकटस्थ राष्ट्रीय नेताओं में एक थे। बीच का रास्ता ढूंढते वक्त उनके नाम पर सहमति बन गई। लेकिन वक्त की नजाकत समझने में राजनाथ सिंह ने देरी नहीं की और मोदी के साथ अपनी जुगलबंदी की कोशिशें तेज कर दीं। ऐसा प्रतीत हुआ कि यह भाजपा का अतीत है जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी और आडवाणी की जुगलबंदी हुआ करती थी। अटल नरमपंथी और आडवाणी पार्टी का कट्टरपंथी चेहरा हुआ करते थे, जताने की कोशिश हुई कि राजनाथ जैसे अटल के स्थान पर हैं और मोदी आडवाणी के। राजनाथ जानते हैं कि भाजपा को ताकत मोदी को आगे करने पर ही मिल सकती है हालांकि इससे घटक दलों के नाराज होने का जोखिम है। सिंह मानकर चल रहे हैं कि घटक दलों में से कुछ यदि छिटके भी तो मोदी की सक्रिय अगुवाई सीटों की भरपाई कर देगी और असली ताकत तब भाजपा के पास होगी। सीटें ज्यादा हुर्इं तो भाजपा अपने मनपसंद नेता को पीएम पद तक पहुंचा देगी। यह नेता बेशक मोदी होंगे लेकिन रणनीति चुनाव बाद पत्ते खोलने की भी है। ऐसे में अध्यक्ष का मन मोदी को अप्रत्यक्ष रूप से पीएम पद का दावेदार जताने की योजना पर चलने का है। इसके लाभ और भी हैं। सत्ता के फैसले के वक्त घटक दल ताकत में हुए तो मोदी के स्थान पर दूसरा चेहरा आगे किया जा सकता है। इसी रणनीति के तहत सिंह खुलकर मोदी का नाम नहीं रखना चाह रहे। इसी रणनीति का एक और प्लस प्वाइंट आडवाणी खेमे के किनारे हो जाने का भी है। सुषमा स्वराज इसी खेमे से हैं और बाल ठाकरे के अंतिम दिनों से शिवसेना उनके आगे आने की पैरवी कर रही है। शिवसेना नहीं चाहती कि मोदी जैसा हिंदुत्व का आक्रामक चेहरा मैदान में हो और उसके वोट बैंक पर भी डाका डाल दे। इसी क्रम में शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे से नजदीकी बढ़ाने की कोशिशें शुरू की हैं। तय है कि दोनों की एकजुटता न केवल सीटें बढ़ाने में मददगार सिद्ध होगी बल्कि मोदी के करिश्मे से भी टक्कर ली जा सकेगी। राज ठाकरे देखो और इंतजार करो की नीति अपना रहे हैं। दरअसल, वह बाल ठाकरे के उस फॉर्मूले पर ही समझौता चाहते हैं जिसके तहत पार्टी (यदि विलय संभव हुआ तब) या गठबंधन की कमान उद्धव संभालें और सरकार उनके नेतृत्व में संचालित की जाए यानि राज मुख्यमंत्री बनें। राजनाथ की नजर जयललिता और नीतीश जैसे उन नेताओं पर भी है जो खुद के पीएम बनने का सपना देख रहे हैं। नीतीश मानकर चल रहे हैं कि अगले चुनाव में वह बिहार की सीटों की बल पर बड़ी कुर्सी तक पहुंच सकते हैं। इसीलिये उन्होंने अपने राज्य में सहयोगी भाजपा को बैक सीट पर बैठा दिया। उसके तमाम नेताओं को अपनी पार्टी की सदस्यता दिला दी है। हालांकि नीतीश के जनाधार में कमी आई है और राज्य के विभिन्न हिस्सों से सरकार के विरुद्ध आक्रोश के संकेत मिलने लगे हैं। भाजपा खुद को सक्रिय नहीं करना चाहतीं ताकि उस पर सरकार की नाकामी का ठींकरा न फूटने पाए। इसके साथ ही नीतीश उस पर सहयोग न करने और अपनी महत्वाकांक्षाओं के पोषण का आरोप न मढ़ सकें। नीतीश की राह में शरद यादव रोड़ा हैं। गठबंधन संयोजक शरद वैसे चमत्कार की आस में है जैसा एचडी देवगौड़ा के प्रधानमंत्री बनने पर हुआ था। राजग में शामिल होने की जयललिता की व्यग्रता भी राजनाथ को फायदे का सौदा लग रही है। जया भी सपना देख रही हैं लेकिन वह सपना पूरा करने के लिए सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की तरह किसी तीसरे मोर्चे की अगुवाई नहीं करना चाहतीं। ओडिशा में बीजू जनता दल से भी भाजपा ने अनौपचारिक तौर पर संपर्क किया है। हालांकि नवीन पटनायक ने कोई सकारात्मक संकेत दिया नहीं है। हरियाणा में भी उसे मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। यहां भाजपा की दोस्ती औपचारिक रूप से पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के पुत्र कुलदीप विश्नोई की पार्टी हरियाणा जनहित कांग्रेस से है। दोनों दलों ने भिवानी संसदीय सीट का उपचुनाव मिलकर लड़ा था जिसमें विश्नोई की जीत हुई थी। समस्या इण्डियन नेशनल लोकदल के अध्यक्ष ओम प्रकाश चौटाला के शिक्षक भर्ती घोटाले में जेल जाने से पैदा हुई है। असल में, पिछले कुछ समय से भाजपा ने चौटाला से नजदीकियां बढ़ाना प्रारंभ कर दिया था, इसी क्रम में वह मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने गुजरात पहुंचे थे जबकि विश्नोई गैरहाजिर रहे थे। चौटाला प्रकरण से कांग्रेस उत्साहित है। भाजपा को अब यह फैसला करना है कि इस राज्य के चुनावी समर में वह अकेले उतरेगी या विश्नोई को फिर साथ लेकर। चुनावों में अभी वक्त है लेकिन राजग की तैयारियां जिस रास्ते पर हैं, उससे लगता है कि पिछले आम चुनाव के बाद वह पहली बार ज्यादा सक्रिय है।

Thursday, January 17, 2013

मुश्किल में फंसा पाकिस्तान

पाकिस्तान जबर्दस्त संकट में है। भारत के साथ सरहद पर पैदा विवाद अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर तूल पकड़ ही रहा है कि उसके सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ की गिरफ्तारी का आदेश देकर मुश्किलें बढ़ा दी हैं। मौलाना ताहिर उल कादरी के नेतृत्व में हजारों प्रदर्शनकारियों ने देश की संसद को घेर लिया है, उनकी मांगें पूरी करने का दम सरकार में दिख नहीं रहा। कट्टरपंथी इस कदर नाक में दम किए हुए हैं कि कराची से लेकर इस्लामाबाद तक सुरक्षा के बंदोबस्त फेल हैं और कानून का इकबाल दम तोड़ चुका है। सत्तासीन सियासतदां समझ नहीं पा रहे कि इन समस्याओं का हल कैसे करें। पाकिस्तान की किस्मत उसके जन्म से ही उसके साथ नहीं है। सेना ने जब चाहा, तब सत्ता पलट दी। देश ने तानाशाही का लम्बा दौर झेला है। फिलवक्त, बड़ा संकट न्यायिक सक्रियता की वजह से है। सुप्रीम कोर्ट भी सत्ता का सिरदर्द बना हुआ है। उसने रेंटल पावर केस की सुनवाई के दौरान देश के प्रधानमंत्री समेत तमाम मुलजिमों को गिरफ्तार करने के आदेश दिए हैं। कुछ महीने पहले यूसुफ रजा गिलानी को इसी न्यायिक सक्रियता की वजह से सत्ता से बाहर होना पड़ा था। रेंटल पावर केस दरअसल पाकिस्तान के पावर सेक्टर में भ्रष्टाचार का बड़ा मामला है। पीएम अशरफ पर रेंटल पावर प्रोजेक्ट लगा रही कंपनियों से रिश्वत लेने का आरोप है। ऐसी नौ फर्मों ने पाकिस्तान सरकार से 2200 करोड़ रुपये एडवांस के रूप में प्राप्त किए थे लेकिन समय पर प्रोजेक्ट शुरू नहीं किए। कई फर्मों ने तो पावर प्लांट लगाए ही नहीं। वर्ष 2008 में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार बनने के बाद अशरफ को जल और ऊर्जा मंत्री बनाया गया था। भ्रष्टाचार के यह आरोप इसी कार्यकाल के हैं। इन्हीं आरोपों की जांच पर नेशनल एकाउंटिबिलिटी ब्यूरो की रिपोर्ट के बाद फरवरी 2011 में उन्हें पद छोड़ना पड़ा था। पिछले साल 18 अप्रैल को गिलानी मंत्रिमंडल में उनकी वापसी हुई और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय प्राप्त हुआ। बीते जून में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से गिलानी को पीएम पद के लिए अयोग्य ठहराए जाने के बाद उन्हें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनाया गया था। एक के बाद एक प्रधानमंत्री को भ्रष्टाचार के आरोपों में विदा कर पाना पीपीपी के लिए संकट की बात है, वह भी तब जबकि नए चुनाव दस्तक दे रहे हैं। राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी चूंकि खुद भी भ्रष्टाचार के आरोपों में गले तक फंसे हैं इसलिये वह दूसरी पंक्ति के नेताओं पर कड़ाई नहीं कर पा रहे। फिर, जैसा कि पाकिस्तान का इतिहास है, भरोसेमंद को ढूंढना नेतृत्व के लिए हमेशा बड़ी समस्या रहा है। दूसरा बड़ा संकट मौलाना ताहिर उल कादरी की ओर से आया है। पाकिस्तानी हुकूमत को हिलाने के मकसद से कादरी के नेतृत्व में निकाले जा रहे इस्लामाबाद मार्च को लोगों का भारी समर्थन मिला है। डरी सरकार ने आवाज दबाने का प्रयास भी किया पर नाकाम रही। समूचे देश में कुछ देर के लिए केबल टीवी पर प्रतिबंध लगाया गया ताकि लोग कादरी की तकरीरें सुन ने सकें। इस्लामाबाद में लाखों कादरी समर्थकों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े गए, फायरिंग भी की गई। पर भीड़ कादरी को सुनती रही। कादरी बहुसंख्यक मुसलमानों के साथ ही अल्पसंख्यक हिंदुओं, ईसाइयों और सिखों के हितों की मांग उठा रहे हैं। अरसे से उपेक्षित अल्पसंख्यक उनके पीछे आंख बंद करके जुटे हैं। अल्पसंख्यकों की आवाज वह यह कहकर उठाते हैं कि सभी धर्मों के लोगों का भी पाकिस्तान में बराबरी का हक है। वो भी इस मुल्क के रहने वाले हैं, हम उनकी आजादी, जान-माल और मजहबी इबादतगाहों की सुरक्षा करने का अपना दायित्व निभाने में नाकाम रहे हैं। कनाडा निवासी पाकिस्तानी मूल के इस्लामी विद्वान डॉक्टर कादिरी के समर्थकों की संख्या लाखों-करोड़ों में है। उनकी जन-कल्याणकारी और शैक्षणिक संस्था मिनहाज उल कुरान कई दर्जन देशों में सक्रिय है। विरोधी उनकी रैली के राजनीतिक निहितार्थ ढूंढ रहे हैं। उनका तर्क है कि इस्लामाबाद मार्च ऐसे समय में हो रहा है, जब देश में मई में चुनाव होने हैं यानि यह एक सियासी रैली है और कादिरी अपने लिए पाकिस्तानी सियासत में जमीन तैयार करने में लगे हैं। सियासी दल उन्हें पाकिस्तानी विरोधी और लोकतंत्र विरोधी ताकतों का एजेंट बताकर खारिज करने की कोशिश कर रहे हैं। कादरी के अल्पसंख्यक स्टंट का ही असर है कि शियाओं के दबाव में सरकार को बलूचिस्तान सरकार को बर्खास्त करना पड़ा है। तीसरा बड़ा संकट भारतीय सैनिकों की हत्या से पैदा हुआ है। आरोप लग रहा है कि पाकिस्तान ने सीमाओं पर जो सैनिक तैनात कर रखे हैं, उनमें आतंकवादियों की भी अच्छी-खासी संख्या है। सीमा पर पाक सेना की बढ़ी सक्रियता को आतंकी सरगना हाफिज सईद और हुर्रियत कांफ्रेंस के मीरवाइज उमक फारुख की सैनिक कमांडरों से मुलाकात से जोड़कर देखा जा रहा है और पाक इसे झुठला नहीं पा रहा। सेना में बढ़ रहे कट्टरपंथी अफसर अपने प्रमुख अशफाक परवेज कियानी की बात नहीं मान रहे। इसके अलावा सैनिक के सिर काटने की घटना पर पाकिस्तान को अपने अमेरिकी आकाओं से फटकार सुननी पड़ी है। ब्रिटेन और फ्रांस जैसे ताकतवर मुल्क भी उसके समक्ष नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। हुक्मरां खुद को इस समय फंसा महसूस कर रहे हैं।

Monday, December 17, 2012

मुलायम का दांव और सवर्ण-मुस्लिम पाले में

समाजवादी पार्टी ने बरसों से बंद आरक्षण की वो पिटारी खोल दी है जो जब-जब खुली, आक्रोश की वजह बन गई। सरकारी नौकरियों में पदोन्नति के आरक्षण का मुद्दा फंस चुका है और सपा अन्य दलों से बहुत आगे है। सवर्ण और मुस्लिम मतों पर उसका निशाना एक साथ लगा है। राज्यसभा ने बेशक, इस सम्बन्ध में संविधान संशोधऩ का बिल पास कर दिया है लेकिन उत्तर प्रदेश में हड़ताल जारी है और आग उत्तराखण्ड समेत अन्य राज्यों में पहुंच गई है। हड़ताल से राज्य कर्मचारी समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी के खेमों में बंट गए हैं। राजनीतिक नुकसान का आंकलन होने लगा है, कांग्रेस और भाजपा को डर लग रहा है कि कहीं सवर्ण और पिछड़ा वर्ग की जातियां उनसे रूठ न जाएं। कांग्रेस को तो मुस्लिमों का भी डर है। इस बार सपा मुखिया राजनीति के चाणक्य सिद्ध हुए हैं। प्रोन्नति में आरक्षण विरोध कर जहां वह सवर्णों के दिल के करीब पहुंचे हैं, वहीं सच्चर कमेटी की सिफारिशों पर मुस्लिमों के लिए आरक्षण मांगकर मुसलमानों को अपनी ओर खींचने में कामयाब रहे हैं। पूरा गणित उन्होंने जिस तरह फैलाया है कि अन्य दल चारों खाने चित्त हैं। विरोध बसपा की मजबूरी है और इससे उसे फायदा नहीं हो रहा बल्कि पुराना वोट बैंक बच भर रहा है। सपा सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देकर विरोध पर उतारू है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले से उत्तर प्रदेश की सरकारी नौकरियों में दलित वर्ग के लिए पदोन्नति में आरक्षण और वरिष्ठता के नियम को गैरकानूनी करार दिया था। समाजवादी पार्टी की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करके पांच साल से रुकी पदोन्नति की प्रक्रिया को पुन: शुरू कर दिया है और दलित वर्ग के लोग सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पलटने के लिए संविधान संशोधन की मांग कर रहे हैं। सरकार संशोधन को तैयार भी है। इसके तहत संविधान संशोधन 17 साल पहले के पूर्ववर्ती प्रभाव से लागू किया जा रहा है। आरक्षण विरोधी कह रहे हैं कि इससे कनिष्ठ कर्मचारी अपने सीनियर के ऊपर हो जाएंगे। आरक्षण की समस्या बरसों पुरानी है जो संविधान बनने से लेकर आज तक सुलझने के बजाए उलझती ही रही है। दरअसल, समाज का वह वर्ग, जो समाज की दिशा तय करता आया है, इसे अपनी परंपरागत स्थिति के लिए खतरा मानता है। आरक्षण जातिबद्ध समाज को समता आधारित समाज में बदलने का एकमात्र संवैधानिक उपाय माना गया था और इसकी समयसीमा तय हुई थी लेकिन बाद में वोटों की राजनीति के तहत निर्णय किए जाते रहे। समानता के लिए पहला कदम जातिवार जनगणना के जरिए जातियों के संबंध में सही आंकड़े इकट्ठा करना था लेकिन इससे सभी सरकारें बचती रहीं। शासक वर्ग ने समस्या का हल करने और उपेक्षित जातियों को समानता तक लाने के स्थान पर आरक्षण को पैंतरे की तरह प्रयोग किया। वह अंग्रेजी की ‘फूट डालो-राज करो’ की नीति के तहत चलते रहे। फूट नहीं होती तो सत्ता के समीकरण वो नहीं होते, जो आज हैं। जातिगत विभाजन की कोशिशें 1932 में शुरू हुर्इं जब कम्युनल अवार्ड से अनुसूचित जातियों और जनजातियों को शेष हिंदुओं से अलग किया गया। इसके बाद अनुसूचित जातियों और जनजातियों को उस शूद्र समाज से भी अलग किया जो एक इकाई के रूप में जाति-व्यवस्था के खिलाफ लम्बे समय से संघर्षरत था। 1907 में डिप्रेस्ड क्लासेस लीग बनने से लेकर 1932 तक जाति-व्यवस्था के खिलाफ लड़ने वाला यही एक जरिया था। ब्रिटिश सरकार के बाद कांग्रेस भी उसी नीति पर चली। तय है कि इससे अनुसूचित जातियों में बेचैनी का भाव है। वह किसी भी तरह आरक्षण का अपना हक खोना नहीं चाहतीं। याद कीजिए, मंडल आयोग की सिफारिशों पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद की स्थिति को। तब इंदिरा साहनी मामले (1992) में आए इस फैसले के पश्चात अनुसूचित जातियों ने पिछड़े वर्गों पर क्रीमीलेयर का संविधान-विरोधी सिद्धांत लागू करने का विरोध नहीं किया क्योंकि यह उनके आरक्षण पर लागू नहीं हुआ था। इसी तरह पदोन्नति में आरक्षण का निषेध भी पिछड़े वर्गों के संदर्भ में ही हुआ था, यह अनुसूचित जातियों और जनजातियों पर लागू नहीं होता था। फिर भी उन्हें चिंता हुई कि यह नियम किसी भी दिन उन पर भी लागू हो सकता है। उन्होंने राजनेताओं पर जोर डालना शुरू किया कि उनकी पदोन्नतियों में आरक्षण को सुरक्षित रखा जाए पर पिछड़ों को भी पदोन्नतियों में आरक्षण मिले यह मांग उन्होंने कभी नहीं की। देश में अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग की सियासत के रूप में भी राजनीति का वर्गीकरण हुआ है। बसपा जैसे दल जहां खुलकर अनुसूचित जातियों की सियासत करते हैं, वहीं अन्य कई पार्टियां पिछड़े वर्ग की भावनाओं का इस्तेमाल कर रही हैं। मौजूदा स्थिति बसपा के लिए जीवन-मरण का प्रश्न है क्योंकि आरक्षण का मसला उसके वोट बैंक से सीधे जुड़ा हुआ है। राज्यसभा में मर्यादाओं से आगे बढ़कर सभापति हामिद अंसारी पर कटाक्ष का मायावती का मकसद भी यही था कि उनके वोट बैंक के पास यह संकेत कतई न जाए कि उनका रवैया ढीला है। अनुसूचित जातियों के वोटों पर कांग्रेस की भी नजर है, इसीलिये वह संविधान संशोधन विधेयक को किसी तरह पारित कराना चाहती है। यह वही कांग्रेस है जिसने 1995 में संविधान संशोधन के माध्यम से ही अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए पदोन्नतियों में आरक्षण की व्यवस्था की थी और पिछड़े वर्गों को इसमें शामिल नहीं किया था। इससे अनुसूचित जातियां और जनजातियां प्रसन्न हुई थीं कि पिछड़ों को यह लाभ नहीं मिलेगा। 1992 के फैसले में यह व्यवस्था भी थी कि कोटे के जो पद भरे नहीं जाएंगे वे खत्म नहीं होंगे बल्कि जमा रहेंगे। हालांकि उसने आरक्षण पर पचास प्रतिशत की सीमा बांध दी थी। आरक्षण के इस मसले पर सभी सरकारों का जो रवैया रहा है, वह कुल मिलाकर निराशाजनक ही कहा जा सकता है। सरकारें वोट बैंक के आधार पर फैसले कर रही हैं और सामाजिक असंतुलन की स्थिति से मुंह मोड़े हुए हैं। जरूरत सतर्क विश्लेषण और निर्णय की है। सरकारी नौकरियों में चयन सरकार की अपनी ही दी हुई एक निश्चित व्यवस्था के अधीन होता है। इसके बावजूद यदि उसे लगातार आरक्षण का दायरा बढ़ाने की जरूरत महसूस हो रही है तो तय है कि उसकी खुद की व्यवस्था में ही खामियां हैं। और अपनी दी हुई व्यवस्था की निष्पक्षता पर स्वयं सरकार का ही भरोसा नहीं है, बाकी जनता उस पर कैसे विश्वास कर सकती? यह सीधे तौर पर स्वयं सरकार की अपनी अक्षमता और विफलता है। अगर स्वतंत्रता के बाद से अब तक के 65 वर्षों में आरक्षण की व्यवस्था से हम उपेक्षित वर्गों का उत्थान सुनिश्चित नहीं कर पाए तो साफ है कि हम भविष्य में भी कामयाब होने का सपना नहीं पाल सकते। यह सिर्फ एक प्रलोभन है और किसी के हित के अनुकूल नहीं।

Monday, December 3, 2012

सियासी बिसात पर सपा का जाति कार्ड

उत्तर प्रदेश में सियासत की नई बिसात बिछ रही है। सपा ने लोकसभा चुनावों की रणनीति के तहत जातिवाद का वह कार्ड चलने की तैयारी की है जो विपक्षी बसपा की नींद उड़ा रहा है। वह 17 उन जातियों को पिछड़ी से अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने जा रही है, जो अब तक बसपा की वोट बैंक कही जाती थीं। ज्यादा फायदे का सौदा किसे पसंद नहीं, सत्ता की इस रिश्वत से वोट बैंक का हस्तांतरण तय माना जा रहा है। सपा का यह दांव अन्य विपक्षी दलों पर भी भारी पड़ना तय है। निषाद, मल्लाह, केवट, बिंद, कश्यप, कहार, राजभर अब तक बसपा की वोट बैंक हैं। इन जातियों के कार्यकर्ताओं की बात छोड़ें, सबसे ज्यादा नेता तक बसपा में हैं। सरकार ने इन जातियों समेत 17 उप जातियों को फिर से अनुसूचित जाति की श्रेणी में शामिल करने के लिए उप समिति गठित की है। कैबिनेट से गठित इस उप समिति की सिफारिश पर राज्य सरकार केंद्र को रिपोर्ट भेजेगी, क्योंकि अनुसूचित जाति में शामिल करने या हटाने की प्रक्रिया केंद्र स्तर पर ही सम्पन्न की जाती है। मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में इस सम्बन्ध में प्रस्ताव भेजा गया था, उप समिति दो महीने के भीतर नई संस्तुतियां भेजेगी। बसपा विरोध कर रही है। उसका कहना है कि यदि प्रस्ताव भेजा ही जा चुका है, तो उप समिति के गठन का औचित्य क्या है। सत्ता हाथ से जाने के बाद मानसिक तौर पर शून्य की सी स्थिति में पहुंच गई बसपा काट ढूंढ नहीं पा रही। वह प्रदेश के अवाम का मिजाज जानती है जो जाति और धर्म को प्रथम प्राथमिकता दिया करता है। यह वह राज्य है जहां वोट हासिल करने के लिए जाति और धर्म के प्रयोग की लम्बी परंपरा है। किसी समय यहां ह्यअजगरह्ण और ह्यमजगरह्ण की बात हुआ करती थी। अहीर, जाट, गूजर और राजपूत इस समीकरण के सबसे बड़े आधार होते थे। मुस्लिम वोट लंबे समय तक कांग्रेस के माने जाते थे, पर बाद में जब समाजवादियों के कारण उनका वोट बैंक बना, तो उसमें मुस्लिमों को शामिल कर उसे ह्यमजगरह्ण कहा जाने लगा। सपा मुस्लिमों में बसपा से बढ़त प्राप्त करती रही है। दलित और पिछड़े वोटों को भुनाने के लिए यहां प्रतिस्पर्धा है। पिछड़े और अशिक्षित उत्तर प्रदेश से जब उत्तराखंड को अलग किया गया, तब से राजनीतिज्ञों के मन में यह बात घर कर गई कि भविष्य में प्रदेश का और भी विभाजन हो सकता है इसीलिए मायावती ने प्रदेश को चार भागों में बांटने का प्रस्ताव तैयार किया। कहा जाता है कि मायावती के समर्थक पहले वोट, फिर रोटी के नारे पर मतदान के दिन सुबह ही घर से निकला करते हैं और वोट डालकर ही अन्य काम किया करते हैं। उन्हें डर रहता है कि बाद में उनके वोट फर्जी ढंग से बसपा से इतर किसी अन्य प्रत्याशी को न पड़ जाएं। इन समर्थकों में सबसे ज्यादा अनुसूचित जाति के लोग हैं। सपा हो या अन्य कोई दल, बसपा के इन जुनूनी मतदाताओं पर सभी की लार टपकती रहती है। इन्हें अपनी ओर लाने की कोशिशें भी इसीलिये की जाती हैं। राज्य में मुसलमान वोटों की मारामारी भी कम नहीं है। आपातकाल के बाद मुस्लिम वोट भले ही कांग्रेस की झोली से निकल गए हों, पर वे जिसको भी मिले, एकमुश्त मिले, इसलिए हर पार्टी इनको लुभाने के दांव चलती रही। सपा के बाद मुस्लिम मत बसपा और कांग्रेस में बंटते नजर आते हैं। केंद्र सरकार ने इस वोट बैंक को रिझाने के लिए कई प्रयास किए हैं। उसने उन्हें पिछड़ों के कोटे में से साढ़े चार प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव रखा है। प्रभावशाली देवबंद मदरसे को खुश करके अपना घोड़ा आगे बढ़ाया है। पिछले कुछ वर्षों से कानून-कायदे और संसद में पास होने वाले बिलों में भी इस स्वर को अधिक बुलंद किया गया कि कांग्रेस मुस्लिमों के प्रति समर्पित है। आतंकवाद के आरोपियों को विभिन्न जेलों से छोड़े जाने और उन पर लगे आरोपों को निरस्त कराने की कवायद भी यह पार्टी करती रही है। हालांकि इस होड़ में अब सपा भी है, उसने दंगों समेत तमाम गंभीरतम आरोपों में फंसे लोगों से मुकदमे वापस लेने की कवायद शुरू की है, उसके यह प्रयास अदालती चक्रव्यूह में फंसे हैं और उनकी आलोचनाएं भी हुई हैं। मुस्लिम मतों पर इतनी मारामारी है कि इतने प्रयासों पर भी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को उतनी अहमियत नहीं दी गई जितनी उसने अपेक्षा की थी। एक समय था कि मुस्लिम मतदाताओं पर उनके नेताओं की जोर-जबर्दस्ती चलती थी, पर पिछले वर्षों में मतदाता परिपक्व हुआ है। नेता तो ठीक, अब तो मौलानाओं के फतवों की भी चिंता वह नहीं किया करता है। दरअसल, वर्तमान पीढ़ी की सोच बदली है। वह धमकी और लालच से परे है, इसलिए कोई यह नहीं कह सकता कि कोई भी दल उन्हें आसानी से फुसला सकता है। यह समस्या और है, जनमोर्चा, यूनाईटेड फ्रंट, पीस पार्टी, राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल, वेलफेयर पार्टी आॅफ इंडिया जैसे दल भी मुस्लिम मतों पर हिस्सा बंटाने आ गए हैं। गत चुनावों में इन्हें भी खासे वोट हासिल हुए हैं। स्थानीय मुसलमानों पर अपनी पकड़ के चलते कई इलाकों में इन दलों ने राज्य और राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों का खेल बिगाड़ा है। प्रदेश में मुस्लिम वोट बैंक की चर्चा करते वक्त यह भी ध्यान में रखा जाना जरूरी है कि यहां कुल 16 प्रतिशत वोटों में 11 प्रतिशत वोट सुन्नियों के हैं और पांच प्रतिशत शियाओं के। यदि विधानसभा सीट वार आंकलन करें तो 23 विधानसभा सीटों पर शिया निर्णायक हैं जबकि 106 सीटों पर शिया मतदाता हैं। सुन्नी मुस्लिमों की संख्या प्रदेश में तमाम सीटों पर अच्छी-खासी हैं, विशेषकर मुरादाबाद, आगरा, कानपुर, वाराणसी आदि में। मुस्लिम मतों पर इसी आपाधापी और अपना अच्छा स्थान होने से निश्चिंत सपा ने इसीलिये बसपा के वोट बैंक मानी जाने वाली जातियों को अपने पाले में खींचने की कोशिशें की हैं। इनके अनुसूचित जाति में शामिल होने का प्रदेश की सियासत पर बड़ा असर पड़ेगा, यह तय है। सपा ने समझदारी से बड़ा कार्ड चला है, इससे न केवल बसपा या कांग्रेस बल्कि कांग्रेस के खेमे में भी बड़ी हलचल मची है। सत्ता के इस प्रस्ताव की काट उन्हें ढूंढे नहीं मिल रही। लोकसभा चुनावों के लिए सपा का यह बड़ा दांव है।